भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 348, कुल 405 में से

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अठारहवाँ प्रकरण । ३४१

आरम्भों में प्रवृत्ति होता भी है, तो भी वह वास्तव में कुछ भी नहीं करता है । क्योंकि वह अहंकार-रूपी मल से रहित है और इसी कारण उसमें कर्तृत्व भाव नहीं है ॥ ६४ ॥

मूलम् ।

स एव धन्यः आत्मज्ञः सर्वभावेषु यः समः ।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्निस्तर्षमानसः ॥ ६५ ॥

पदच्छेदः ।

सः, एव, धन्यः, आत्मज्ञः, सर्वभावेषु, यः, समः, पश्यन्, शृण्वन्, स्पृशन्, जिघ्रन्, अश्नन्, निस्तर्षमानसः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
सः एव=वहीशृण्वन्=सुनता हुआ
आत्मज्ञः=आत्म-ज्ञानीस्पृशन्=स्पर्श करता हुआ
धन्यः=धन्य हैजिघ्रन्=सूँघता हुआ
यः=जोअश्नन्=खाता हुआ
निस्तर्षमानसः=तृष्णा-रहितसर्वभावेषु=सब भावों में
पश्यन्=देखता हुआसमः=एक रस है ॥

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! वही आत्मज्ञानी पुरुष धन्य है, जिसको सब प्राणियों में आत्मबुद्धि है । इसी कारण उसका चित्त तृष्णा से रहित है । वह सर्व पदार्थों को देखता हुआ, श्रवण करता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूंघता हुआ, खाता हुआ भी कुछ नहीं करता है, किन्तु वह सर्वदा शान्त एक-रस है ॥ ६५ ॥