अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 349, कुल 405 में से
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३४२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
मूलम् ।
क्व संसारः क्व चाभासः क्व साध्यं क्व च साधनम् ।
आकाशस्येव धीरस्य निर्विकल्पस्य सर्वदा ॥ ६६ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, संसारः, क्व, च, आभासः, क्व, साध्यम्, क्व, च, साधनम्, आकाशस्य, इव, धीरस्य, निर्विकल्पस्य, सर्वदा ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| सर्वदा | =सर्वदा | क्व | =कहाँ |
| आकाशस्य इव | =आकाशवत् | साभासः | =उसका भान है |
| निर्विकल्पस्व | =विकल्प-रहित | क्व | =कहाँ |
| धीरस्य | =ज्ञानी को | साध्यम् | =साध्य अर्थात् स्वर्ग है |
| क्व | =कहाँ | च | =और |
| संसारः | =संसार है | साधनम् | = साधन अर्थात् अज्ञादि कर्म है ॥ |
| च | =और |
भावार्थ ।
जो विद्वान् सर्वदा संकल्प-विकल्पों से रहित है, उसको प्रपञ्च कहाँ और उसकी दृष्टि में स्वर्गादिक कहाँ । जब उसकी दृष्टि में स्वर्गादिक ही नहीं, तब उनका साधनीभूत यागादिक उसकी दृष्टि में कहाँ ? आत्मवित् जीवन्मुक्त की दृष्टि में जब कि सर्वत्र एक आत्मा ही व्यापक परिपूर्ण है, दूसरा कोई पदार्थ ही नहीं है, तब स्वर्ग-नरक और उनके साधन-भूत पुण्य-पापादिक भी कहीं नहीं ॥ ६६ ॥