भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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अठारहवां प्रकरण । ३४३

मूलम् ।

स जयत्यर्थसंन्यासी पूर्णस्वरसविग्रहः ।
अकृत्रिमोऽनवविच्छिन्ने समाधिर्यस्य वर्तते ॥ ६७ ॥

पदच्छेदः ।

सः, जयति, अर्थसंन्यासी, पूर्णस्वरसविग्रहः, अकृत्रिमः, अनवच्छिन्ने, समाधिः, यस्य, वर्त्तते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
सः =वहीयस्य =जिसकी
अर्थसंन्यासी =दृष्टादृष्ट कर्म-फलअकृत्रिमः =स्वाभाविक
पूर्णस्वरस-विग्रहः =पूर्णानन्द-स्वरूपवाला ज्ञानीसमाधिः =समाधि
अनवच्छिन्ने =अपने पूर्ण स्वरूप में
जयति =जय को प्राप्त होता हैवर्तते =वर्तती है ॥

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जो विद्वान् दृष्ट-अदृष्ट अर्थात् इस लोक के और परलोक के फलों की कामना से रहित है, अर्थात् जो निष्काम है, वही परिपूर्ण स्वरूपवाला है । अर्थात् अपने स्वरूप में ही जिसकी समाधि सर्वदा बनी रहती है, वही विद्वान् है, वह सबसे श्रेष्ठ होकर संसार में फिरता है ॥ ६७ ॥


मूलम् ।

बहुनात्र किमुक्तेन ज्ञाततत्त्वो महाशयः ।
भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी सदा सर्वत्र नीरसः ॥ ६८ ॥