भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 337, कुल 405 में से

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पृष्ठ 337

३३० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

तु=परन्तुकृत्रिमा=बनावटवाली
संस्पृहचित्तस्य=$\Big{ इच्छा-सहित चित्तवालेशान्तिः=शान्ति
मूढ़स्य=अज्ञानी कीन राजते=नहीं शोभती है ॥

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जो पुरुष निःस्पृह है, उसकी भी स्वाभाविक स्थिति शोभा करके युक्त ही होती है । क्योंकि उसमें कोई बनावट नहीं होती है । और जो मूढ़ इच्छा करके व्याकुल है, उसकी बनावट की शान्ति भी शोभायमान नहीं होती है ॥ ५२ ॥

मूलम् ।

विलसन्ति महाभोगैर्विशन्ति गिरिगह्वरान् ।
निरस्तकल्पना धीरा अबद्धा मुक्तबुद्धयः ॥ ५३ ॥

पदच्छेदः ।

विलसन्ति, महाभोगैः, विशन्ति, गिरिगह्वरान्, निरस्तकल्पनाः, धीराः, अबद्धाः, मुक्तबुद्धयः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
निरस्तकल्पना=कल्पना-रहितविलसन्ति=क्रीड़ा करते हैं
अबद्धाः=बन्धन-रहित+ च=और
मुक्तबुद्धयः=मुक्त बुद्धिवाले+कदाचित्=कभी
धीराः=ज्ञानीगिरिगह्वरान्=$\Big{ पहाड़ की कन्दराओं में
\textbf{+ कदाचित् \textbf{+प्रारब्धवशात्=$\Big{ कभी प्रारब्ध- वश सेविशन्ति=प्रवेश करते हैं ॥
महाभोगैः=$\Big{ बड़े-बड़े भोगों के साथ
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