अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
३३० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| तु=परन्तु | कृत्रिमा=बनावटवाली |
| संस्पृहचित्तस्य=$\Big{ इच्छा-सहित चित्तवाले | शान्तिः=शान्ति |
| मूढ़स्य=अज्ञानी की | न राजते=नहीं शोभती है ॥ |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जो पुरुष निःस्पृह है, उसकी भी स्वाभाविक स्थिति शोभा करके युक्त ही होती है । क्योंकि उसमें कोई बनावट नहीं होती है । और जो मूढ़ इच्छा करके व्याकुल है, उसकी बनावट की शान्ति भी शोभायमान नहीं होती है ॥ ५२ ॥
मूलम् ।
विलसन्ति महाभोगैर्विशन्ति गिरिगह्वरान् ।
निरस्तकल्पना धीरा अबद्धा मुक्तबुद्धयः ॥ ५३ ॥
पदच्छेदः ।
विलसन्ति, महाभोगैः, विशन्ति, गिरिगह्वरान्, निरस्तकल्पनाः, धीराः, अबद्धाः, मुक्तबुद्धयः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| निरस्तकल्पना | =कल्पना-रहित | विलसन्ति | =क्रीड़ा करते हैं |
| अबद्धाः | =बन्धन-रहित | + च | =और |
| मुक्तबुद्धयः | =मुक्त बुद्धिवाले | +कदाचित् | =कभी |
| धीराः | =ज्ञानी | गिरिगह्वरान् | =$\Big{ पहाड़ की कन्दराओं में |
| \textbf{+ कदाचित् \textbf{+प्रारब्धवशात् | =$\Big{ कभी प्रारब्ध- वश से | विशन्ति | =प्रवेश करते हैं ॥ |
| महाभोगैः | =$\Big{ बड़े-बड़े भोगों के साथ |
अठारहवाँ प्रकरण । ३३१
भावार्थ । जिस ज्ञानी धीर के चित्त की सब कल्पनाएँ नष्ट हो गई हैं, वह प्रारब्ध के वश कभी भोगों विषे क्रीड़ा करता है, कभी प्रारब्धवश पर्वत और वनों में फिरा करता है, पर उसका चित्त सदा शान्त रहता है । क्योंकि वह आसक्ति कर्त्तृत्वाऽध्यास से रहित बुद्धिवाला है ॥ ५३ ॥
मूलम् । श्रोत्रियं देवतां तीर्थमंगनां भूपतिं प्रियम् । दृष्ट्वा संपूज्य धीरस्य न कापि हृदि वासना ॥ ५४ ॥
पदच्छेदः । श्रोत्रियम्, देवताम्, तीर्थम्, अंगनाम्, भूपतिम्, प्रियम्, दृष्ट्वा, संपूज्य, धीरस्य, न, का, अपि, हृदि, वासना ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| श्रोत्रियम्=पण्डित को | प्रियम्=पुत्रादि को |
| देवताम्=देवता को | दृष्ट्वा=देख करके |
| तीर्थम्=तीर्थ को | धीरस्य=ज्ञानी के |
| संपूज्य=पूजन करके | हृदि=हृदय में |
| + च=और | का अपि=कोई भी |
| अंगनाम्=स्त्री को | वासना=वासना |
| भूपतिम्=राजा को | न भवति=नहीं होती है ॥ |
भावार्थ । हे शिष्य ! जो श्रोत्रिय ब्रह्मवेत्ता हैं, उन विषे इन्द्र,
३३२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
अग्नि आदिक देवताओं, गंगा आदिक तीर्थों के पूजा करने से कामना उत्पन्न नहीं होती है । क्योंकि वे निष्काम हैं और सुन्दर स्त्री-पुत्रादिकों के प्रति और राजा को देख करके भी उनके चित्त में कोई वासना खड़ी नहीं होती है । क्योंकि वे सर्वत्र समबुद्धि और समदर्शी हैं ॥ ५४ ॥
मूलम् । भृत्यैः पुत्रैः कलत्रैश्च दौहित्रैश्चापि गोत्रजैः । विहस्य धिक्कृतो योगी न यातिविकृतिं मनाक् ॥ ५५ ॥
पदच्छेदः । भृत्यैः, पुत्रैः, कलत्रैः, च, दौहित्रैः, च, अपि, गोत्रजैः, विहस्य, धिक्कृतः, योगी, न, याति, विकृतिम्, मनाक् ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| भृत्यैः=किंकरों करके | धिक्कृतः=धिक्कार किया हुआ |
| पुत्रैः=पुत्रों करके | योगी=ज्ञानी |
| दौहित्रैः=नातियों करके | मनाक्=किंचित् भी |
| च=और | विकृतिम्=विकार को अर्थात् चित्त के क्षोभ को |
| गोत्रजैः=बान्धवों करके | |
| अपि=भी | |
| विहस्य=हँस करके | न याति=नहीं प्राप्त होता है ॥ |
भावार्थ । हे शिष्य ! जो ज्ञानी जीवन्मुक्त हैं, उनका चित्त भृत्यों करके याने नौकरों करके, पुत्रों करके, स्त्रियों करके, कन्याओं करके और स्वगोत्रियों करके अर्थात् सम्बन्धियों करके भी तिरस्कार किया हुआ क्षोभ को नहीं प्राप्त होता है । और
अठारहवाँ प्रकरण । ३३३
उन करके सत्कार किया हुआ न हर्ष को प्राप्त होता है। क्योंकि राग-द्वेष का हेतु जो मोह है, सो मोह उनमें नहीं है ॥ ५५ ॥
मूलम् । संतुष्टोऽपि न सन्तुष्टः खिन्नोऽपि न च खिद्यते । तस्याश्चर्यदशां तां तां तादृशा एव जानते ॥ ५६ ॥
पदच्छेदः । सन्तुष्टः, अपि, न, संतुष्टः, खिन्नः, अपि, न, च, खिद्यते, तस्य, आश्चर्यदशाम्, ताम्, ताम्, तादृशाः, एव, जानते ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| + ज्ञानी=ज्ञानी पुरुष | अपि=भी |
| + लोकदृष्ट्या=लोक-दृष्टि से | न खिद्यते= { नहीं दुःख को प्राप्त होता है |
| संतुष्टः=सन्तोषवान् हुआ | तस्य=उसकी |
| अपि=भी | ताम् ताम्=उस उस |
| न=नहीं | आश्चर्यदशाम्=आश्चर्य दशा को |
| संतुष्टः=संतुष्ट है | तादृशा एव=वैसे ही ज्ञानी |
| च=और | जानते=जानते हैं ॥ |
| खिन्नः=खेद को पाया हुआ |
भावार्थ । हे शिष्य ! लोक-दृष्टि करके खेद को प्राप्त हुआ भी वह खेद को नहीं प्राप्त होता है और लोक-दृष्टि करके हर्ष को प्राप्त हुआ वह हर्ष को नहीं प्राप्त होता है । ऐसे विद्वान् की आश्चर्यवत् लीला को विद्वान् ही जानता है, दूसरा नहीं ॥ ५६ ॥
३३४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
मूलम् । कर्त्तव्यतैव संसारो न तां पश्यन्ति सूरयः । शून्याकारा निराकारा निर्विकारा निरामयाः ॥ ५७ ॥
पदच्छेदः । कर्त्तव्यता, एव, संसारः, न, ताम्, पश्यन्ति, सूरयः, शून्याकाराः, निराकाराः, निर्विकाराः, निरामयाः ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| कर्त्तव्यता=कर्त्तव्यता | निर्विकाराः=संकल्प-रहित |
| एव=ही | च=और |
| संसारः=संसार है | निरामयाः=दुःख-रहित |
| ताम्=उस कर्त्तव्यता को | सूरयः=ज्ञानी |
| शून्याकाराः=शून्याकार | न पश्यन्ति=नहीं देखते हैं ॥ |
| निराकाराः=आकार-रहित |
भावार्थ । हे शिष्य ! “ममेदं कर्त्तव्यम्” मेरे को यह कर्त्तव्य है, ऐसे निश्चय का नाम ही संसार है । इसी कारण जीवन्मुक्त ज्ञानी उस कर्त्तव्यता को नहीं देखता है, और न उसका संकल्प करता है । क्योंकि वह संकल्प-मात्र से रहित है, वह शून्याकार है, और निराकारादि संकल्पों से भी रहित है, और विकारों से भी रहित है, और जो आध्यात्मिकादि रोग हैं, उनसे भी रहित है ॥ ५७ ॥
मूलम् । अकुर्वन्नपि स क्षोभाद्व्यग्रः सर्वत्र मूढधीः । कुर्वन्नपि तु कृत्यानि कुशलो हि निराकुलः ॥ ५८ ॥
अठारहवाँ प्रकरण । ३३५
पदच्छेदः ।
अकुर्वन्, अपि, संक्षोभात्, व्यग्रः, सर्वत्र, मूढधीः, कुर्वन्, अपि, तु, कृत्यानि, कुशलः, हि, निराकुलः ॥
अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । मूढधीः = अज्ञानी | च = और अकुर्वन् = कर्मों को नहीं करता हुआ | कुशलः = ज्ञानी अपि = भी | च = और सर्वत्र = सब जगह | कृत्यानि = कर्मों को संक्षोभात् = संकल्प-विकल्प के कारण | कुर्वन् = करता हुआ व्यग्रः = व्याकुल | अपि = भी भवति = होता है | हि = निश्चय करके | निराकुलः = निश्चय चित्तवाला | भवति = होता है ॥
भावार्थ ।
हे शिष्य ! अज्ञानी शून्य मंदिरों में और वनादिक, पर्वतादिक एकांत स्थानों में कर्मों को अर्थात् शरीर इन्द्रियादि के व्यापारों को न करता हुआ भी संकल्पों से व्यग्र चित्तवाला ही होता है, और विद्वान् सर्वत्र शरीर इन्द्रियादिकों के व्यापारों को लोक-दृष्टि करके करता हुआ भी व्यग्र चित्तवाला नहीं होता है । क्योंकि वह निःसंकल्प है ॥ ५८॥
मूलम् ।
सुखमास्ते सुखं शेते सुखमायाति याति च । सुखं वक्ति सुखं भुङ्क्तेव्यवहारेऽपि शान्तधीः ॥ ५९ ॥
३३६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः । सुखम्, आस्ते, सुखम्, शेते, सुखम्, आयाति, याति, च सुखम्, वक्ति, सुखम्, भुंक्ते, व्यवहारे, अपि, शान्तधीः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| व्यवहारे= | व्यवहार में | च= | और |
| अपि= | भी | याति= | जाता है |
| शान्तधीः= | ज्ञानी | सुखम्= | सुख-पूर्वक |
| सुखम्= | सुख-पूर्वक | वक्ति= | बोलता है |
| आस्ते= | बैठता है | च= | और |
| सुखम्= | सुख-पूर्वक | सुखम्= | सुख-पूर्वक |
| आयाति= | आता है | भुङ्क्ते= | भोजन करता है ॥ |
भावार्थ । जीवन्मुक्त ज्ञानी व्यवहार आदिकों में भी आत्मसुख करके ही स्थित रहता है । बैठते-उठते, शयन करते, खाते-पीते संपूर्ण क्रियाओं को करते हुए भी विद्वान् शान्तचित्त-वाला रहता है ॥ ५९ ॥
मूलम् । स्वभावाद्यस्य नैवार्त्तिर्लोकवद्व्यवहारिणः । महाह्रद इवाक्षोभ्यो गतक्लेशः सुशोभते ॥ ६० ॥
पदच्छेदः । स्वभावात्, यस्य, न, एव, आर्त्तिः, लोकवत्, व्यवहारिणः, महाह्रदः, इव, अक्षोभ्य, गतक्लेशः, सुशोभते ॥
अठारहवां प्रकरण । ३३७
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यस्य=जिस | न=नहीं | ||
| व्यवहारिण=व्यवहार करनेवाले | एव=निश्चय करके | ||
| ज्ञानिन्=ज्ञानी को | सः=वह | ||
| गतक्लेश=क्लेश-रहित ज्ञानी | |||
| स्वभावात्={ | आत्मज्ञान के | महाह्रद इव=समुद्रवत् | |
| स्वभाव से | अक्षोभ्य=क्षोभ-रहित | ||
| लोकवत्=लोक की तरह | सुशोभते=शोभायमान होता है ॥ |
भावार्थ ।
ज्ञानवान् व्यवहार को करता हुआ भी अज्ञानी पुरुषों की तरह खेद को नहीं प्राप्त होता है। वह महाह्रद की तरह क्षोभ से रहित शोभा को प्राप्त होता है ॥ ६० ॥
मूलम् ।
निवृत्तिरपि मूढस्य प्रवृत्तिरुपजायते ।
प्रवृत्तिरपि धीरस्य निवृत्तिफलदायिनी ॥ ६१ ॥
पदच्छेदः ।
निवृत्तिः, अपि, मूढस्य, प्रवृत्तिः, उपजायते, प्रवृत्तिः, अपि, धीरस्य, निवृत्तिफलदायिनी ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| मूढस्य=मूढ़ की | च=और | ||
| निवृत्तिः=निवृत्ति | धीरस्य=ज्ञानी की | ||
| अपि=भी | प्रवृत्तिः=प्रवृत्ति | ||
| प्रवृत्तिः=प्रवृत्ति-रूप | अपि=भी | ||
| उपजायते=होती है | निवृत्तिफल-दायिनी={ | निवृत्त के फल को देनेवाली है ॥ |
३३८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
मूढ़ पुरुष के इन्द्रियों के व्यापारों की निवृत्ति तो लोक-दृष्टि करके अवश्य प्रतीत होती है, परन्तु वह निवृत्ति प्रवृत्ति ही है । क्योंकि उसके अहंकारादिक निवृत्ति नहीं हुए हैं और ज्ञानवान् की लोक-दृष्टि करके इन्द्रियों की प्रवृत्ति प्रतीत भी होती है, तो भी वह निवृत्ति रूप ही है, और मुक्ति-रूपी फल को देनेवाली है । क्योंकि उसमें अभिमान का अभाव है ॥ ६१ ॥
मूलम् ।
परिग्रहेषु वैराग्यं प्रायो मूढस्य दृश्यते । देहे विगलिताशस्य क्व रागः क्व विरागता ॥ ६२ ॥
पदच्छेदः ।
परिग्रहेषु, वैराग्यम्, प्रायः, मूढस्य, दृश्यते, देहे, विगलिताशस्य, क्व, रागः, क्व, विरागता ॥
अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । मूढस्य=ज्ञानी का | विगलिताशस्य= { गलित होगई है वैराग्यम्=वैराग्य | { आशा जिसकी प्रायः=विशेष करके | { ऐसे ज्ञानी को परिग्रहेषु=गृह आदि में | क्व=कहाँ दृश्यते=देखा जाता है | रागः=राग है परन्तु=परन्तु | च=और देहे=देह में | क्व=कहाँ | विरागता=वैराग्य है ॥
अठारहवाँ प्रकरण । ३३९
भावार्थ ।
हे शिष्य ! देहाभिमानी मूढ़ पुरुष को देह के साथ सम्बन्धवाले जो धन, वेश्या आदिक हैं, उनमें यदि किसी निमित्त से वैराग्य भी उत्पन्न हो जावे, तो भी वह वैराग्य शून्य है, परन्तु जिसका देहादिकों के साथ अभिमान नष्ट हो गया है, उसको देहसम्बन्धी पुत्रादिकों में न राग है, और शत्रु-व्याघ्रादिकों में न विराग है, राग और विराग उसको होता है, जिसको अपने देह का अभिमान है ॥ ६२ ॥
मूलम् ।
भावनाभावनासक्ता दृष्टिर्मूढस्य सर्वदा । भाव्यभावनया सा तु स्वस्थस्यादृष्टिरूपिणी ॥ ६३ ॥
पदच्छेदः ।
भावनाभावनासक्ता, दृष्टिः, मूढस्य, सर्वदा, भाव्य-भावनया, सा, तु, स्वस्थस्य, अदृष्टिरूपिणी ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| मूढस्य= | अज्ञानी की | सा= | दृष्टि |
| दृष्टिः= | दृष्टि | भाव्यभावनया= | दृष्टि की चिन्ता से युक्त हो करके |
| सर्वदा= | सर्वदा | ||
| भावनाभावना-सक्ता= | भावना में या अभावना में लगी हुई है | अपि= | भी |
| अदृष्टिरूपिणी= | दृश्य के दर्शन से रहित रूप- वाली | ||
| तु= | परन्तु | ||
| स्वस्थस्य= | ज्ञानी की | भवति= | होती है ॥ |
३४० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
हे शिष्य ! मूढ़ पुरुष कहता है कि मैं भावना करता हूँ, मैं अभावना करता हूँ । इस प्रकार सर्वदा भावना-अभावना में ही आसक्त रहता है । क्योंकि उसको भावना-अभावना में अहंकार है । और जो अपने स्वरूप में निष्ठा-वाला है, उसकी दृष्टि भावना-अभावना से रहित होकर सर्वदा अपने आत्मा में ही रहती है ॥ ६३ ॥
मूलम् ।
सर्वारम्भेषु निष्कामो यश्चरेद्बालवन्मुनिः ।
न लेपस्तस्य शुद्धस्य क्रियमाणेऽपि कर्मणि ॥ ६४ ॥
पदच्छेदः ।
सर्वारम्भेषु, निष्कामः, यः, चरेत्, बालवत्, मुनिः, न, लेपः, तस्य, शुद्धस्य, क्रियमाणे, अपि, कर्मणि ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यः= | जो | चरेत्= | करता है |
| मुनिः= | ज्ञानी | तस्य= | उस |
| बालवत्= | बालकों की तरह | शुद्धस्य= | शुद्ध-स्वरूप को |
| निष्कामः= | कामना-रहित होकर | $\left.\begin{matrix} \textbf{क्रियमाणे} \ \textbf{कर्मण्यपि} \end{matrix}\right}=$ | $\left{\begin{matrix} किये हुए कर्म में \ भी \end{matrix}\right.$ |
| सर्वारम्भेषु= | $\left{\begin{matrix} सब क्रियाओं में \ आरम्भ \end{matrix}\right.$ | लेपः न भवति= | लेप नहीं होता है ॥ |
भावार्थ ।
जो विद्वान् बालक की तरह कामना से रहित होकर पहले जन्म के कर्मों के वश से अर्थात् प्रारब्ध-वश से सम्पूर्ण
अठारहवाँ प्रकरण । ३४१
आरम्भों में प्रवृत्ति होता भी है, तो भी वह वास्तव में कुछ भी नहीं करता है । क्योंकि वह अहंकार-रूपी मल से रहित है और इसी कारण उसमें कर्तृत्व भाव नहीं है ॥ ६४ ॥
मूलम् ।
स एव धन्यः आत्मज्ञः सर्वभावेषु यः समः ।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्निस्तर्षमानसः ॥ ६५ ॥
पदच्छेदः ।
सः, एव, धन्यः, आत्मज्ञः, सर्वभावेषु, यः, समः, पश्यन्, शृण्वन्, स्पृशन्, जिघ्रन्, अश्नन्, निस्तर्षमानसः ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| सः एव=वही | शृण्वन्=सुनता हुआ |
| आत्मज्ञः=आत्म-ज्ञानी | स्पृशन्=स्पर्श करता हुआ |
| धन्यः=धन्य है | जिघ्रन्=सूँघता हुआ |
| यः=जो | अश्नन्=खाता हुआ |
| निस्तर्षमानसः=तृष्णा-रहित | सर्वभावेषु=सब भावों में |
| पश्यन्=देखता हुआ | समः=एक रस है ॥ |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! वही आत्मज्ञानी पुरुष धन्य है, जिसको सब प्राणियों में आत्मबुद्धि है । इसी कारण उसका चित्त तृष्णा से रहित है । वह सर्व पदार्थों को देखता हुआ, श्रवण करता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूंघता हुआ, खाता हुआ भी कुछ नहीं करता है, किन्तु वह सर्वदा शान्त एक-रस है ॥ ६५ ॥
३४२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
मूलम् ।
क्व संसारः क्व चाभासः क्व साध्यं क्व च साधनम् ।
आकाशस्येव धीरस्य निर्विकल्पस्य सर्वदा ॥ ६६ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, संसारः, क्व, च, आभासः, क्व, साध्यम्, क्व, च, साधनम्, आकाशस्य, इव, धीरस्य, निर्विकल्पस्य, सर्वदा ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| सर्वदा | =सर्वदा | क्व | =कहाँ |
| आकाशस्य इव | =आकाशवत् | साभासः | =उसका भान है |
| निर्विकल्पस्व | =विकल्प-रहित | क्व | =कहाँ |
| धीरस्य | =ज्ञानी को | साध्यम् | =साध्य अर्थात् स्वर्ग है |
| क्व | =कहाँ | च | =और |
| संसारः | =संसार है | साधनम् | = साधन अर्थात् अज्ञादि कर्म है ॥ |
| च | =और |
भावार्थ ।
जो विद्वान् सर्वदा संकल्प-विकल्पों से रहित है, उसको प्रपञ्च कहाँ और उसकी दृष्टि में स्वर्गादिक कहाँ । जब उसकी दृष्टि में स्वर्गादिक ही नहीं, तब उनका साधनीभूत यागादिक उसकी दृष्टि में कहाँ ? आत्मवित् जीवन्मुक्त की दृष्टि में जब कि सर्वत्र एक आत्मा ही व्यापक परिपूर्ण है, दूसरा कोई पदार्थ ही नहीं है, तब स्वर्ग-नरक और उनके साधन-भूत पुण्य-पापादिक भी कहीं नहीं ॥ ६६ ॥
अठारहवां प्रकरण । ३४३
मूलम् ।
स जयत्यर्थसंन्यासी पूर्णस्वरसविग्रहः ।
अकृत्रिमोऽनवविच्छिन्ने समाधिर्यस्य वर्तते ॥ ६७ ॥
पदच्छेदः ।
सः, जयति, अर्थसंन्यासी, पूर्णस्वरसविग्रहः, अकृत्रिमः, अनवच्छिन्ने, समाधिः, यस्य, वर्त्तते ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| सः = | वही | यस्य = | जिसकी |
| अर्थसंन्यासी = | दृष्टादृष्ट कर्म-फल | अकृत्रिमः = | स्वाभाविक |
| पूर्णस्वरस-विग्रहः = | पूर्णानन्द-स्वरूपवाला ज्ञानी | समाधिः = | समाधि |
| अनवच्छिन्ने = | अपने पूर्ण स्वरूप में | ||
| जयति = | जय को प्राप्त होता है | वर्तते = | वर्तती है ॥ |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जो विद्वान् दृष्ट-अदृष्ट अर्थात् इस लोक के और परलोक के फलों की कामना से रहित है, अर्थात् जो निष्काम है, वही परिपूर्ण स्वरूपवाला है । अर्थात् अपने स्वरूप में ही जिसकी समाधि सर्वदा बनी रहती है, वही विद्वान् है, वह सबसे श्रेष्ठ होकर संसार में फिरता है ॥ ६७ ॥
मूलम् ।
बहुनात्र किमुक्तेन ज्ञाततत्त्वो महाशयः ।
भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी सदा सर्वत्र नीरसः ॥ ६८ ॥
३४४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
बहुना, अत्र, किम्, उक्तेन, ज्ञाततत्त्वः, महाशयः, भोग- मोक्षनिराकाङ्क्षी, सदा, सर्वत्र, नीरसः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अत्र = | इसमें | भोगमोक्षनिरा- <br> काङ्क्षी = | $\left.\begin{aligned} \text{} \ \text{} \end{aligned}\right}$ भोग और मोक्ष की <br> आकांक्षा का त्यागी |
| बहुना = | बहुत | महाशयः = | ज्ञानी |
| उक्तेन = | कहने से | सदा = | सदैव |
| किम् = | क्या प्रयोजन है | सर्वत्र = | सर्वत्र |
| ज्ञाततत्त्वः = | तत्त्व जाननेवाला | नीरसः = | राग-द्वेष रहित है ॥ |
भावार्थ ।
हे जनक ! जो विद्वान् ज्ञाततत्व है, अर्थात् जिस विद्वान् ने आत्मतत्त्व को जान लिया है, उसी का नाम ज्ञाततत्त्व है। क्योंकि वह भोग और मोक्ष दोनों में निराकांक्षी है, आकांक्षा से रहित है। अर्थात् दोनों में राग द्वेष से रहित है ॥ ६८ ॥
मूलम् ।
महदादि जगद्वैतं नाममात्रविजृम्भितम् । विहाय शुद्धबोधस्य किं कृत्यमवशिष्यते ॥ ६९ ॥
पदच्छेदः ।
महदादि, जगत्, द्वैतम्, नाममात्रविजृम्भितम्, विहाय, शुद्धबोधस्य, किम्, कृत्यम्, अवशिष्यते ॥
अठारहवाँ प्रकरण । ३४५
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| महदादि = | महत्तत्त्व आदि | विहाय = | छोड़कर |
| द्वैतम् जगत् = | द्वैत जगत् | शुद्धबोधस्य = | शुद्ध-बुद्ध-स्वरूप- वाले को |
| नाममात्र-विजृम्भितम् = | नाम-मात्र भिन्न है | किम् = | क्या |
| तत्र = | उसमें | कृत्यम् = | कर्तव्यता |
| कल्पनाम् = | कल्पना को | अवशिष्यते = | अवशेष रहती है ॥ |
भावार्थ ।
हे जनक ! महदादिरूप जितना जगत् है, अर्थात् महत्, अहंकार, पञ्चतन्मात्रा, पञ्चमहाभूत और उनका कार्य-रूप जितना जगत् है, वह केवल नाम-मात्र करके ही फैला है, और आत्मा से भिन्न की नाईं प्रतीत होता है, परन्तु वास्तव में भिन्न नहीं है ।
वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यमिति श्रुतेः ।
जितना कि नाम का विषय-विकार है, वह सब वाणी का कथन-मात्र ही है । मृत्तिका ही सत्य है ॥ १ ॥
इसी तरह जितना कि नाम का घटपटादि-रूप जगत् है, वह सब कल्पना-मात्र ही है, अधिष्ठान-रूप ब्रह्म ही सत्य है ।
जिस विद्वान् ने संपूर्ण कल्पना का त्याग कर दिया है, जो केवल शुद्ध चैतन्य-स्वरूप में ही स्थित है, उसको कोई कर्तव्य बाकी नहीं रहा है ॥ ६९ ॥
मूलम् ।
भ्रमभूतमिदं सर्वं किञ्चिन्नास्तीति निश्चयी ।
अलक्ष्यस्फुरणा शुद्धः स्वभावेनैव शाम्यति ॥ ७० ॥
३४६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
भ्रमभूतम्, इदम्, सर्वम्, किञ्चित्, न, अस्ति, इति, निश्चयी, अलक्ष्यस्फुरणः शुद्धः, स्वभावेन, एव, शाम्यति ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| इदम्=यह | शुद्धः=शुद्ध |
| सर्वम्=सब | निश्चयी=निश्चय करनेवाला |
| भ्रमभूतम्=प्रपञ्च | स्वभावेन=स्वभाव से |
| किञ्चित्=कुछ | एव=हि |
| न अस्ति=नहीं है | शाम्यति= शान्ति को प्राप्त होता है ॥ |
| इति=ऐसा | |
| अलक्ष्यस्फुरण=चैतन्यात्मानुभवी |
भावार्थ ।
**प्रश्न—**अनर्थ की शान्ति के लिये प्रयत्न करना चाहिये ?
**उत्तर—**अधिष्ठान के साक्षात्कार होने पर यह संपूर्ण जगत् भ्रम करके ही कल्पित प्रतीत होता है। वास्तव में कुछ भी सत्य प्रतीत नहीं होता है। जिस पुरुष को ऐसा ज्ञान है, वह कुछ भी प्रयत्न नहीं करता है। क्योंकि वह स्वभाव करके ही शान्तरूप है। शान्ति के लिये फिर उसको कुछ भी कर्तव्य बाकी नहीं रहता है ॥ ७० ॥
मूलम् ।
शुद्धस्फुरणरूपस्य दृश्य भावमपश्यतः ।
क्व विधि क्व च वैराग्यं क्व त्यागः क्व शमोऽपि वा ॥ ७१ ॥
अठारहवाँ प्रकरण । ३४७
पदच्छेदः ।
शुद्धस्फुरणरूपस्य, दृश्यभावम्, अपश्यतः, क्व, विधिः, क्व, च, वैराग्यम्, क्व, त्यागः, क्व, शमः, अपि, वा ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| दृश्यभावम् = | दृश्यभाव को | च = | और |
| अपश्यतः = | नहीं देखते हुए | क्व = | कहाँ |
| शुद्धस्फुरण-रूपस्य = | शुद्ध स्फुरण-रूप वाले को | त्यागः = | त्याग है |
| वा अपि = | अथवा | ||
| क्व = | कहाँ | क्व = | कहाँ |
| विधिः = | कर्म की विधि है | शमः = | शम है ॥ |
भावार्थ ।
जो विद्वान् शुद्ध-स्वरूप, स्वप्रकाश, चिद्रूप, अपने आपको देखता है, वह किसी और दृश्य पदार्थ को नहीं देखता है । उसको कर्म में राग कहाँ है ? और विधि कहाँ है ? और किस विषय में उसको वैराग्य है,और किसमें शम है ॥ ७१ ॥
मूलम् ।
स्फुरतोऽनन्तरूपेण प्रकृतिं च न पश्यतः ।
क्व बन्धः क्व च वा मोक्षः क्व हर्षः क्व विषादता ॥ ७२ ॥
पदच्छेदः ।
स्फुरतः, अनन्तरूपेण, प्रकृतिम्, च, न, पश्यतः, क्व, बन्धः, क्व, च, वा, मोक्षः, क्व, हर्ष, क्व, विषादता ॥
३४८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| च = | और | क्व = | कहाँ |
| अनन्तरूपेण = | अनन्तरूप-से | मोक्षः = | मोक्ष है |
| प्रकृतिम् = | माया को | वा = | और |
| न पश्यतः = | नहीं देखते हुए | क्व = | कहाँ |
| स्फुरतः = | प्रकाशमानअर्थात् ज्ञान को | हर्षः = | हर्ष है |
| च = | और | ||
| क्व = | कहाँ | क्व = | कहाँ |
| बन्धः = | बन्धन है | विषादता = | शोक है ॥ |
भावार्थ । जो चिद्रूप आत्मा में कार्य के सहित माया को नहीं देखता है, उसकी दृष्टि में बन्ध कहाँ है ? मोक्ष कहाँ है ? और हर्ष-विषाद कहाँ है ? ॥ ७२ ॥
मूलम् । बुद्धिपर्यन्त संसारे मायामात्रं विवर्त्तते । निर्ममो निरहङ्कारो निष्कामः शोभते बुधः ॥ ७३ ॥
पदच्छेदः । बुद्धिपर्यन्तसंसारे, मायामात्रम्, विवर्त्तते, निर्ममः, निरहङ्कारः, निष्कामः, शोभते, बुधः ।
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| $\left.\begin{aligned} बुद्धिपर्यन्त- \ संसारे \end{aligned}\right}=$ | बुद्धि पर्यन्त संसार में | जगत् = | जगत्-भाव को |
| मायामात्रम् = | माया-विशिष्ट चैतन्य | विवर्त्तते = | कल्पित करता है |
| बुधः = | ज्ञानी पुरुष |
अठारहवाँ प्रकरण । ३४९
| निर्ममः=ममता-रहित | निष्कामः=कामना-रहित |
|---|---|
| निरहङ्कारः=अहंकार-रहित | शोभते=शोभायमान होता है ॥ |
भावार्थ ।
आत्म-ज्ञान पर्यन्त ही है संसार जिसमें, अर्थात् आत्मज्ञान-रूप अन्तवाले संसार में माया सबल चेतन ही विवर्तरूप कल्पित जगदाकार हो भासता है। ऐसे निश्चय-वाले विद्वान् का शरीरादिकों में अहंकार नहीं रहता है। वह ममता से और कामना से रहित होकर विचरता है ॥ ७३ ॥
मूलम् ।
अक्षयं गतसंतापमात्मानं पश्यतो मुनेः । क्व विद्या च क्व वा विश्वं क्व देहोऽहं ममेति वा ॥७४॥
पदच्छेदः ।
अक्षयम्, गतसंतापम्, आत्मानम्, पश्यतः, मुनेः, क्व, विद्या, च, क्व, वा, विश्वम्, क्व, देहः, अहम्, मम, इति, वा ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अक्षयम् | =अविनाशी | क्व | =कहाँ |
| च | =और | विश्वम् | =विश्व है |
| गतसंतापम् | =संताप-रहित | वा | =अथवा |
| आत्मानम् | =आत्मा के | क्व | =कहाँ |
| पश्यतः | =देखनेवाले | देहः | =देह है |
| मुनेः | =मुनि को | वा | =और |
| क्व | =कहाँ | क्व | =कहाँ |
| विद्या | =विद्या, शास्त्र | अहम् मम | =अहंमम भाव है ॥ |
| च | =और |