अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 356, कुल 405 में से
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अठारहवाँ प्रकरण । ३४९
| निर्ममः=ममता-रहित | निष्कामः=कामना-रहित |
|---|---|
| निरहङ्कारः=अहंकार-रहित | शोभते=शोभायमान होता है ॥ |
भावार्थ ।
आत्म-ज्ञान पर्यन्त ही है संसार जिसमें, अर्थात् आत्मज्ञान-रूप अन्तवाले संसार में माया सबल चेतन ही विवर्तरूप कल्पित जगदाकार हो भासता है। ऐसे निश्चय-वाले विद्वान् का शरीरादिकों में अहंकार नहीं रहता है। वह ममता से और कामना से रहित होकर विचरता है ॥ ७३ ॥
मूलम् ।
अक्षयं गतसंतापमात्मानं पश्यतो मुनेः । क्व विद्या च क्व वा विश्वं क्व देहोऽहं ममेति वा ॥७४॥
पदच्छेदः ।
अक्षयम्, गतसंतापम्, आत्मानम्, पश्यतः, मुनेः, क्व, विद्या, च, क्व, वा, विश्वम्, क्व, देहः, अहम्, मम, इति, वा ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अक्षयम् | =अविनाशी | क्व | =कहाँ |
| च | =और | विश्वम् | =विश्व है |
| गतसंतापम् | =संताप-रहित | वा | =अथवा |
| आत्मानम् | =आत्मा के | क्व | =कहाँ |
| पश्यतः | =देखनेवाले | देहः | =देह है |
| मुनेः | =मुनि को | वा | =और |
| क्व | =कहाँ | क्व | =कहाँ |
| विद्या | =विद्या, शास्त्र | अहम् मम | =अहंमम भाव है ॥ |
| च | =और |