अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अठारहवाँ प्रकरण । ३४९
| निर्ममः=ममता-रहित | निष्कामः=कामना-रहित |
|---|---|
| निरहङ्कारः=अहंकार-रहित | शोभते=शोभायमान होता है ॥ |
भावार्थ ।
आत्म-ज्ञान पर्यन्त ही है संसार जिसमें, अर्थात् आत्मज्ञान-रूप अन्तवाले संसार में माया सबल चेतन ही विवर्तरूप कल्पित जगदाकार हो भासता है। ऐसे निश्चय-वाले विद्वान् का शरीरादिकों में अहंकार नहीं रहता है। वह ममता से और कामना से रहित होकर विचरता है ॥ ७३ ॥
मूलम् ।
अक्षयं गतसंतापमात्मानं पश्यतो मुनेः । क्व विद्या च क्व वा विश्वं क्व देहोऽहं ममेति वा ॥७४॥
पदच्छेदः ।
अक्षयम्, गतसंतापम्, आत्मानम्, पश्यतः, मुनेः, क्व, विद्या, च, क्व, वा, विश्वम्, क्व, देहः, अहम्, मम, इति, वा ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अक्षयम् | =अविनाशी | क्व | =कहाँ |
| च | =और | विश्वम् | =विश्व है |
| गतसंतापम् | =संताप-रहित | वा | =अथवा |
| आत्मानम् | =आत्मा के | क्व | =कहाँ |
| पश्यतः | =देखनेवाले | देहः | =देह है |
| मुनेः | =मुनि को | वा | =और |
| क्व | =कहाँ | क्व | =कहाँ |
| विद्या | =विद्या, शास्त्र | अहम् मम | =अहंमम भाव है ॥ |
| च | =और |
३५० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
जो विद्वान् नाश से रहित, संतापों से रहित आत्मा को देखता है, उसको विद्या कहाँ ? और शास्त्र कहाँ ? क्योंकि उसकी दृष्टि में न जगत है, और न शरीर है । आत्मा से अतिरिक्त का उसमें स्फुरण नहीं होता है ॥७४॥
मूलम् ।
निरोधादीनि कर्माणि जहाति जडधीर्यदि ।
मनोरथान्प्रलापांश्चकर्तुमाप्नोत्यतत्क्षणात् ॥ ७५ ॥
पदच्छेदः ।
निरोधादीनि, कर्माणि, जहाति, जडधीः, यदि, मनोरथान्, प्रलापान्, च, कर्तुम्, आप्नोति, अतत्क्षणात् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यदि | =जब | अतत्क्षणात् | =तभी से |
| जडधीः | =अज्ञानी | मनोरथान् | =मनोरथों |
| निरोधादीनि | =चित्त-निरोधादिक | च | =और |
| कर्माणि | =कर्मों को | प्रलापान् | =प्रलापों के |
| जहाति | =त्यागता है | कर्तुम् | =करने को |
| आप्नोति | =प्रवृत्त होता है ॥ |
भावार्थ ।
यदि अज्ञानी चित्त के निरोधादि कर्मों का त्याग भी कर देवे, तो भी वह मनोराज्यादिकों और वाणी के प्रलापों को किया करता है ॥ ७५ ॥
अठारहवाँ प्रकरण । ३५१
मूलम् । मन्दः श्रुत्वापि तद्वस्तु न जहाति विमूढताम् । निर्विकल्पो बहिर्यत्नादन्तर्विषयलालसः ॥ ७६ ॥
पदच्छेदः । मन्दः, श्रुत्वा, अपि, तत्, वस्तु, न, जहाति, विमूढताम्, निर्विकल्पः बहिः, यत्नात्, अन्तर्विषयलालसः ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| मन्दः = मूर्ख | परन्तु = परन्तु |
| तत् = उस | बहिः = बाह्य |
| वस्तु = आत्मा को | यत्नात् = व्यापार से |
| श्रुत्वा = सुन करके | निर्विकल्पः = संकल्प-रहित हुआ |
| अपि = भी | अन्तर्विषय-लालसः = भीतर याने मन में विषय का लालसावाला |
| विमूढताम् = मूढ़ता को | भवति = होता है ॥ |
| न जहाति = नहीं त्याग करता है |
भावार्थ । मूर्ख आत्मा का श्रवण करके भी अपनी मूर्खता का त्याग नहीं करता है । मलिन चित्तवाले को आत्मा के श्रवण करने से भी ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती है । मूर्ख बाह्य व्यापार से रहित होता हुआ भी मन में विषयों को धारण किया करता है ॥ ७६ ॥
मूलम् । ज्ञानाद्गलितकर्मा यो लोकदृष्ट्यापि कर्मकृत् । नाप्नोत्यवसरं कर्तुं वक्तुमेव न किञ्चन ॥ ७७ ॥
३५२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
ज्ञानात्, गलितकर्मा, यः, लोकदृष्ट्या, अपि, कर्मकृत्, न, आप्नोति, अवसरम्, कर्तुम्, वक्तुम्, एव, न, किञ्चन ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| ज्ञानात् = | ज्ञान से | न = | न |
| गलितकर्मा = | नष्ट हुआ है कर्म जिसका, ऐसा | किञ्चन = | कुछ |
| यः = | जो ज्ञानी | कर्तुम् = | करने को |
| लोकदृष्टचा = | लोक-दृष्टि करके | अवसरम् = | अवसर |
| कर्मकृत् = | कर्म का करनेवाला | आप्नोति = | पाता है |
| अपि = | भी | च = | और |
| अस्ति = | है | न = | न |
| परन्तु = | परन्तु | किञ्चन = | कुछ |
| सः = | वह | वक्तुम्एव = | कहने को ॥ |
भावार्थ ।
जिस विद्वान् का अध्यास कर्मों में आत्म-ज्ञान से नष्ट हो गया है, वह लोक-दृष्टि से कर्म करता हुआ मालूम देता है, परन्तु मैं कर्म को करता हूँ, ऐसा वह कभी भी नहीं कहता है । क्योंकि उसको आत्म-ज्ञान के प्रताप से कर्म-फल की इच्छा ही नहीं होती है ॥ ७७ ॥
मूलम् ।
क्व तमः क्व प्रकाशो वा हानं क्व च न किञ्चन । निर्विकारस्य धीरस्य निरातंकस्य सर्वदा ॥ ७८ ॥
अठारहवाँ प्रकरण । ३५३
पदच्छेदः ।
क्व, तमः, क्व, प्रकाशः, वा, हानम्, क्व, च, न, किञ्चन,
निर्विकारस्य, धीरस्य, निरातंकस्य, सर्वदा ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| निर्विकारस्य=निर्विकार | वा=अथवा |
| च=और | क्व=कहाँ |
| सर्वदा=सर्वदा | प्रकाशः=प्रकाश है |
| निरातंकस्य=निर्भय | च=और |
| धीरस्य=ज्ञानी को | क्व=कहाँ |
| क्व=कहाँ | हानम्=त्याग है |
| तमः=अन्धकार है | न किञ्चन=कुछ नहीं है ॥ |
भावार्थ ।
हे शिष्य ! जिस विद्वान् के मोहादि-रूप सब विकार दूर हो गए हैं, उसकी दृष्टि में तम कहाँ है ? और तम के अभाव होने से प्रकाश कहाँ है ? ये दोनों सापेक्षिक हैं। एक के न होने से दूसरे की भी स्थिति नहीं है। क्योंकि लौकिक दृष्टि करके ही तम और प्रकाश हैं, सो लौकिक दृष्टि उसकी आत्म-दृष्टि करके नष्ट हो जाती है, इसलिए उसकी दृष्टि में प्रकाश और तम दोनों नहीं रहते हैं। ऐसे विद्वान् को कालादिकों का भी भय नहीं रहता है। उसको न कहीं हानि है, न लाभ है, न किसी में राग है, न द्वेष है, न ग्रहण है, न त्याग है ॥ ७८ ॥
मूलम् ।
क्व धैर्यं क्व विवेकित्वं क्व निरातंकतापि वा ।
अनिर्वाच्यस्वभावस्य निःस्वभावस्य योगिनः ॥ ७९ ॥
३५४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
क्व, धैर्यम्, क्व, विवेकित्वम्, क्व, निरातंकता, अपि, वा, अनिर्वाच्यस्वभावस्य, निःस्वभावस्य, योगिनः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| $\left.\begin{matrix}अनिर्वाच्यस्व-\ भावस्य\end{matrix}\right}=$ | $\left{\begin{matrix}अनिर्वचनस्वभाव-\ वाले\end{matrix}\right.$ | विवेकित्वम्= | विवेकता |
| क्व= | कहाँ | ||
| च= | और | वा= | अथवा |
| निःस्वभावस्य= | स्वभाव-रहित | निरातंकत= | निर्भयता |
| योगिनः= | योगी को | अपि= | भी |
| धैर्यम्= | धीरता | ||
| क्व= | कहाँ है | क्व= | कहाँ |
भावार्थ ।
अनिर्वाच्य स्वभाववाले योगी को धीरता कहाँ है ? और विवेकता कहाँ ? स्वभाव-रहित योगी को भय और निर्भयता कहाँ ? वह सदा आनन्द-रूप एकरस है ॥ ७९ ॥
मूलम् ।
न स्वर्गो नैव नरको जीवन्मुक्तिर्न चैव हि ।
बहुनात्र किमुक्तेन योगदृष्टया न किञ्चन ॥ ८० ॥
पदच्छेदः ।
न, स्वर्गः, न, एव, नरकः, जीवन्मुक्तिः, न, च, एव, हि, बहुना, अत्र, किम्, उक्तेन, योगदृष्टया, न, किञ्चन ॥
अठारहवाँ प्रकरण । ३५५
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| ज्ञानिनम् | ज्ञानी को | हि | निश्चय करके |
| न | न | अत्र | इसमें |
| स्वर्गः | स्वर्ग है | बहुना | बहुत |
| न | न | उक्तेन | कहने से |
| नरकः एव | नरक ही है | किम् | क्या प्रयोजन है |
| च | और | योगिनम् | योगी को |
| न | न | योगदृष्ट्या | योग-दृष्टि से |
| जीवन्मुक्ति एव | जीवन्मुक्ति ही | किञ्चन न | कुछ भी नहीं है ॥ |
भावार्थ । जीवन्मुक्त आत्म-ज्ञानी की दृष्टि में न स्वर्ग है, और न नरक है। **प्रश्न—**नास्तिक भी स्वर्ग-नरक को नहीं मानता है, अर्थात् नास्तिक की दृष्टि में भी न स्वर्ग है, न नरक है, तब नास्तिक में और जीवन्मुक्त में कुछ भी भेद न रहा ? **उत्तर—**नास्तिक की दृष्टि में यह लोक तो है, परन्तु परलोक नहीं है, और न उसकी दृष्टि में आत्मा ही है । वह तो केवल शून्य को ही मानता है, और ज्ञानी जीवन्मुक्त की दृष्टि में लोक-परलोक दोनों नहीं हैं, किन्तु सर्वत्र एक आत्मा ही परिपूर्ण व्यापक है । आत्मा से अतिरिक्त और कुछ भी विद्वान् की दृष्टि में नहीं है ॥ ८० ॥
मूलम् । नैव प्रार्थयते लाभं नालाभेनानुशोचति । धीरस्य शीतलं चित्तममृतेनैव पूरितम् ॥ ८१ ॥
३५६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
न, एव, प्रार्थयते, लाभम्, न, अलाभेन, अनुशोचति, धीरस्य, शीतलम्, चित्तम्, अमृतेन, एव, पूरितम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| धीरस्य = | ज्ञानी का | लाभम् = | लाभ के लिये |
| चित्तम् = | चित्त | प्रार्थयते = | प्रार्थना करता है |
| अमृतेन = | अमृत से | च = | और |
| पूरितम् = | पूरित हुआ | न = | न |
| शीतलम् = | शीतल है | अलाभेन = | हानि होने से |
| अतः एव = | इसी लिये | एव = | कभी |
| न = | न | अनुशोचति = | शोच करता है ॥ |
| सः = | वह |
भावार्थ ।
जीवन्मुक्त ज्ञानी न लाभ की प्रार्थना करता है, और न अलाभ पर शोक करता है, किन्तु उसका चित्त परमानन्द-रूपी अमृत द्वारा ही तृप्त अर्थात् आनन्दित रहता है ॥ ८१ ॥
मूलम् ।
न शान्तं स्तौति निष्कामा न दुष्टमपि निन्दति ।
समदुःखसुखस्तृप्तः किञ्चित्कृत्यं न पश्यति ॥ ८२ ॥
पदच्छेदः ।
न, शान्तम्, स्तौति, निष्कामः, न, दुष्टम्, अपि, निन्दति, समदुःखसुखः, तृप्तः, किञ्चित्, कृत्यम्, न, पश्यति ॥
अठारहवाँ प्रकरण । ३५७
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| निष्कामः = | कामना-रत पुरुष अर्थात् ज्ञानी | समदुःख-सुखः = | सुख और दुःख है तुल्य जिसको, ऐसा |
| शान्तम् = | शान्त पुरुष को | योगी = | योगी |
| न = | न | तृप्तः = | आनन्दित होता हुआ |
| स्तौति = | स्तुति करता है | कृत्यम् = | किये हुए कर्म को |
| अपि = | और | किञ्चित् = | कुछ भी |
| दुष्टम् = | दुष्ट पुरुष को | न = | न |
| न = | न | पश्यति = | देखता है ॥ |
| निन्दति = | निन्दा करता है |
भावार्थ ।
विद्या और कामुक कर्मों से रहित जो ज्ञानी है, वह शान्ति आदिक शुद्ध गुणों द्वारा युक्त हुए पुरुष की स्तुति नहीं करता है ।
निःस्तुतिर्निर्नमस्कारो निःस्वधाकार एव च ।
चलाचलानिकेतश्च यतिर्निष्कामुको भवेत् ॥ १ ॥
ज्ञानवान् यति किसी न स्तुति करता है, न किसी को नमस्कार करता है, न अग्नि में हवनादि करता है । वह न एक जगह वास करता है, और न वह किसी की निंदा करता है, सुख-दुःख में सम रहता है, निष्काम होने से किसी कृत्य को नहीं देखता है ॥ ८२ ॥
मूलम् ।
धीरो न द्वेष्टि संसारमात्मानं न दिदृक्षति ।
हर्षामर्षविनिर्मुक्तो न मृतो न च जीवति ॥ ८३ ॥
३५८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
धीरः, न, द्वेष्टि, संसारम्, आत्मानम्, न, दिदृक्षति, हर्षामर्षविनिर्मुक्तः, न, मृतः, न, च, जीवति ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| हर्षामर्षविनिर्मुक्तः= | हर्ष-रोष-रहित | दिदृक्षति= | देखने की इच्छा करता है । |
| धीरः= | ज्ञानी | सः= | वह |
| संसारम्= | संसार के प्रति | न= | न |
| न= | न | मृतः= | मरा हुआ |
| द्वेष्टि= | द्वेष करता है | च= | और |
| च= | और | न= | न |
| न= | न | जीवति= | जीवता है ॥ |
भावार्थ ।
जो धीर विद्वान् जीवन्मुक्त है, वह संसार के साथ द्वेष नहीं करता है । क्योंकि वह संसार को देखता ही नहीं है, अपने आत्मा को ही देखता है । और यदि संसार को देखता है, तो बाधितानुवृत्ति द्वारा देखता है । और इसीलिये वह संसार के साथ द्वेष नहीं करता है । परिपक्व अवस्था में वह आत्मा को भी नहीं देखता है । क्योंकि वह स्वयम् आत्मा-रूप है और इसी कारण वह हर्षादिकों से और जन्म-मरण से रहित है ॥ ८३ ॥
मूलम् ।
निःस्नेहः पुत्रदारादौ निष्कामो विषयेषु च । निश्चिन्तः स्वशरीरेऽपि निराशः शोभते बुधः ॥ ८४ ॥
अठारहवाँ प्रकरण । ३५९
पदच्छेदः ।
निःस्नेहः, पुत्रदारादौ, निष्कामः, विषयेषु, च, निश्चिन्तः, स्वश, रीरे, अपि, निराशः, शोभते, बुधः ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| पुत्रदारादौ=पुत्र और स्त्री आदिकों में | अपि=और |
| निःस्नेहः=स्नेह-रहित | स्वशरीरे=अपने शरीर में |
| च=और | निश्चिन्तः=चिन्ता-रहित |
| विषयेषु=विषयों में | बुधः=ज्ञानी |
| निष्कामः=कामना-रहित | शोभते=शोभायमान होता है ॥ |
भावार्थ ।
विद्वान् जीवन्मुक्त निराश होकर ही शोभा को पाता है । क्योंकि स्त्री-पुत्रादि के स्नेह से वह रहित है, और इसी कारण विषयों में और भोगों में वह निष्काम है । अर्थात् अपने शरीर की स्थिति के लिये भी भोजन आदिकों की चिन्ता नहीं करता है ॥ ८४ ॥
मूलम् ।
तुष्टिः सर्वत्र धीरस्य यथापतितवर्तिनः !
स्वच्छन्दं चरतो देशान्यत्रास्तमितशायिनः ॥ ८५ ॥
पदच्छेदः ।
तुष्टिः, सर्वत्र, धीरस्य, यथापतितवर्तिनः, स्वच्छन्दम्, चरतः, देशान्, यत्र, अस्तमितशायिनः ॥
३६० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| यत्र = जहाँ | चरतः = फिरनेवाले |
| अस्तमितशायिनः = सूर्य अस्त होता है, वहाँ ही शयन करनेवाले | धीरस्य = ज्ञानी को |
| यथापतितवर्तिनः = पतितवर्त्ती के समान | |
| च = और | सर्वत्र = सर्वत्र |
| स्वच्छन्दम् = इच्छानुसार | तुष्टिः = आनन्द |
| देशान् = देशों में | भवति = होता है ॥ |
भावार्थ ।
धीर विद्वान् को जैसे-जैसे प्रारब्धवश से पदार्थ की प्राप्ति होती है, वैसे ही वैसे वह संतुष्ट रहता है, और प्रारब्ध के वश से नाना प्रकार के देशों में, वनों में, नगरों में विचरता हुआ सर्वत्र ही तुष्ट रहता है ॥ ८५ ॥
मूलम् ।
पततूदेतु वा देहो नास्य चिन्ता महात्मनः ।
स्वभावभूमिविश्रान्तिविस्मृताशेषसंसृतेः ॥ ८६ ॥
पदच्छेदः ।
पततु, उदेतु, वा, देहः, न, अस्य, चिन्ता, महात्मनः, स्वभाव भूमि विश्रान्तिविस्मृताशेषसंसृतेः ॥
अठारहवाँ प्रकरण । ३६१
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| स्वभावभूमि-विश्रान्तिवि-स्मृताशेषसंसृतेः = | जो निज स्वभाव रूपी भूमिमें विश्राम करता है, विस्मरण है संपूर्ण संसार जिसको, ऐसे | चिन्ता= | चिन्ता |
| न= | नहीं है | ||
| वा= | चाहे | ||
| देहः= | देह | ||
| महात्मनः= | महात्मा को | उदेतु= | स्थित रहें |
| अस्य= | इस बात की | वा= | चाहे |
| पततु= | नाश होवे ॥ |
भावार्थ ।
जिस विद्वान् को अपना स्वरूप ही भूमि है, अर्थात् विश्राम का स्थान है । जिसको अपने स्वरूप में विश्राम करके किसी प्रकार की भी चिन्ता नहीं होती है, चाहे, देह रहे, वा न रहे, वही जीवन्मुक्त है, वही संसार से निवृत्त है॥८६॥
मूलम् ।
अकिञ्चनः कामचारो निर्द्वन्द्वश्छिन्नसंशयः ।
असक्तः सर्वभावेषु केवलो रमते बुधः ॥ ८७ ॥
पदच्छेदः ।
अकिञ्चन, कामचारः, निर्द्वन्द्वः, छिन्नसंशयः असक्तः, सर्वभावेषु, केवलः, रमते, बुधः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अकिञ्चनः= | गृहस्थधर्म-रहित | बुधः= | ज्ञानी |
| कामचारः= | विधि-निषेध-रहित | ||
| असक्तः= | असक्ति-रहित | सर्वभावेषु= | सब भावों में |
| केवलः= | विकार-रहित | रमते= | रमण करता है ॥ |
३६२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
जीवन्मुक्त निर्विकार होकर संसार में रमण करता है, अपने पास कुछ भी नहीं रखता है । वह विधि-निषेध का किङ्कर नहीं होता है । स्वच्छन्दचारी है । अपनी इच्छा से विचरता है । सुख-दुःखादि द्वन्द्वों से वह रहित है, संशयों से भी रहित है, वह किसी पदार्थ में भी आसक्त नहीं है ॥ ८७॥
मूलम् ।
निर्ममः शोभते धीरः समलोष्टाश्मकाञ्चनः । सुभिन्नहृदयग्रन्थिर्विनिर्धूतरजस्तमः ॥ ८८ ॥
पदच्छेदः ।
निर्ममः, शोभते, धीरः, समलोष्टाश्मकाञ्चनः, सुभिन्न-हृदयग्रन्थिः, विनिर्धूतरजस्तमः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| निर्ममः = | जो ममता-रहित है | सुभिन्नहृदय-ग्रन्थिः = | टूट गई है हृदय की ग्रन्थि जिसकी |
| समलोष्टाश्म-काञ्चनः = | जिसको ढेला पत्थर और स्वर्ण समान है | निर्धूतरज-स्तमः = | धुल गया है रज और तम स्वभाव जिसका, ऐसा ज्ञानी |
| शोभते = | शोभायमान होता है ॥ |
भावार्थ ।
ममता से रहित ही जीवन्मुक्त ज्ञानी शोभा को पाता है । क्योंकि उसकी दृष्टि में पत्थर, मिट्टी और सोना
अठारहवाँ प्रकरण । ३६३
बराबर हैं । आत्म-ज्ञान के बल से उसके हृदय की ग्रन्थि टूट गई है, रज-तम-रूप मल उसके दूर हो गये हैं ॥ ८८ ॥
मूलम् ।
सर्वत्रानवधानस्य न किञ्चिद्वासना हृदि । मुक्तात्मनो वितृप्तस्य तुलना केन जायते ॥ ८९ ॥
पदच्छेदः ।
सर्वत्र, अनवधानस्य, न, किञ्चित्, वासना, हृदि; मुक्तात्मनः, वितृप्तस्य, तुलना, केन, जायते ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| सर्वत्र=सब विषयों में | ईदृशस्य=ऐसे |
| अनवधानस्य=आसक्ति-रहित | तृप्तस्य=तृप्त हुए |
| हृदि=हृदय में | मुक्तात्मनः=ज्ञानी की |
| किञ्चित्=कुछ भी | तुलना=बराबरी |
| वासना=वासना | केन=किसके साथ |
| न=नहीं है | जायते=की जा सकती है । |
भावार्थ ।
जिस विद्वान् को किसी विषय में चित्त की रुचि नहीं है, और जिसके हृदय में किञ्चित् भी वासना नहीं है, वही अध्यास से रहित ज्ञानी है । उसकी तुलना किसी के साथ नहीं की जा सकती है, केवल ज्ञानी के साथ ही की जाती है ॥ ८९ ॥
३६४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
मूलम् ।
जानन्नपि न जानाति पश्यन्नपि न पश्यति ।
ब्रुवन्नपि न च ब्रूते कोऽन्यो निर्वासनादृते ॥ ९० ॥
पदच्छेदः ।
जानन्, अपि, न, जानाति, पश्यन्, अपि, न, पश्यति, ब्रुवन्, अपि, न, च, ब्रूते, कः, अन्यः, निर्वासनात्, ऋते ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| निर्वासनात् | =वासना-रहित पुरुष से | जानाति | =जानता है |
| ऋते | =इतर | पश्यन् | =देखता हुआ |
| अन्यः | =दूसरा | अपि | =भी |
| कः | =कौन है | न पश्यति | =नहीं देखता है |
| यः | =जो | च | =और |
| जानन् | =जानता हुआ | ब्रुवन् | =बोलता हुआ |
| अपि | =भी | अपि | =भी |
| न | =नहीं | न ब्रूते | =नहीं बोलता है । |
भावार्थ ।
जीवन्मुक्त विद्वान् पदार्थों को जानता हुआ भी नहीं जानता है, देखता हुआ भी नहीं देखता है, कथन करता हुआ भी नहीं कथन करता है, लोक-दृष्टि करके जानता भी है, देखता भी है, सुनता भी है, परन्तु परमार्थ-दृष्टि करके न देखता है, न सुनता है, न बोलता है, निर्वासनिक ज्ञानी के बिना दूसरा ऐसा कौन कर सकता है, किन्तु कोई भी नहीं कर सकता है ॥ ९० ॥
अठारहवाँ प्रकरण । ३६५
मूलम् । भिक्षुर्वा भूपतिर्वापि यो निष्कामः स शोभते । भावेषु गलिता यस्य शोभनाऽऽशोभना मतिः ॥ ९१ ॥
पदच्छेदः । भिक्षुः, वा, भूपतिः, वा, अपि, यः, निष्कामः, सः, शोभते, भावेषु, गलिता, यस्य, शोभनाऽशोभना, मतिः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| भावेषु= | सब भावों में | यः= | जो |
| गलिता= | गलित हुई है | सः= | वह |
| शोभनाऽऽशोभना= | श्रेष्ठ, अश्रेष्ठ | शोभते= | शोभायमान होता है |
| मतिः= | बुद्धि | वा= | चाहे |
| यस्य= | जिसकी | भिक्षु= | भिक्षु हो |
| तस्मात्= | इसीलिये | अपि= | और |
| निष्कामः= | कामना-रहित है | वा= | चाहे |
| भूपतिः= | राजा हो ॥ |
भावार्थ । जिस विद्वान् की उत्तम पदार्थों में इच्छा-बुद्धि नहीं है, और अनुत्तम पदार्थों में दोष-बुद्धि नहीं है, ऐसा जो निष्काम है, वह चाहे भिक्षुक हो, अथवा राजा हो, संसार में वही शोभा को प्राप्त होता है । राजाओं में निष्काम जनक और श्रीरामचन्द्रजी हुए हैं, जिनके यश को आज तक संसार में लोग गान करते हैं । और विरक्तों में जड़भरत, दत्तात्रेय और याज्ञवल्क्य आदि हुए हैं, जिनके शुद्ध चरित्र हस्तामल-कवत् सबकी दृष्टि में दिखाई दे रहे हैं ॥ ९१ ॥
३६६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
मूलम् ।
क्व स्वाच्छन्द्यं क्व संकोचः क्व वा तत्त्वविनिश्चयः ।
निर्व्याजार्जवभूतस्य चरितार्थस्य योगिनः ॥ ९२ ॥
पदच्छेदः ।
क्वः, स्वाच्छन्द्यम्, क्व, संकोचः, वा, तत्त्वविनिश्चयः,
निर्व्याजार्जवभूतस्य, चरितार्थस्य, योगिनः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| निर्व्याजार्जव-भूतस्य = | निष्कपट और सरल-रूप | स्वाच्छन्द्यम् = | स्वतन्त्रता है |
| क्व = | कहाँ | ||
| च = | और | संकोचः = | संकोच है |
| चरितार्थस्य = | यथोचित | वा = | अथवा |
| योगिनः = | योगी को | क्व = | कहाँ |
| क्व = | कहाँ | तत्त्वविनिश्चयः = | तत्त्व का निश्चय है ॥ |
भावार्थ । जो निष्कपट योगी है, कोमल स्वभाववाला है, आत्म-निष्ठावाला है, पूर्णार्थी है, स्वेच्छा-पूर्वक आचारवाला है, उसको संकोच कहाँ है ? और वृत्त्यादि संचरण कहाँ है ? उसको कर्तृ त्व कहाँ है ? कहीं नहीं है; क्योंकि पदार्थों में उसका अध्यास नहीं है ॥ ९२ ॥
मूलम् ।
आत्मविश्रान्तितृप्तेन निराशेन गतार्तिना ।
अन्तर्यदनुभूयेत तत्कथं कस्य कथ्यते ॥ ९३ ॥
अठारहवाँ प्रकरण । ३६७
पदच्छेदः ।
आत्मविश्रान्तितृप्तेन, निराशेन, गतार्तिना, अन्तः, यत्, अनुभूयेत, तत्, कथम्, कस्य, कथ्यते ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| आत्मविश्रान्ति-तृप्तेन = | $\Big{$ आत्मा में विश्राम कर तृप्त हुए | यत् = | जो |
| अनुभूयेत = | अनुभव होता है | ||
| च = | और | तत् = | सो |
| निराशेन = | आधार-रहित हुए | कस्य = | $\Big{$ किस याने किस अधिकारी के प्रति |
| गतार्त्तिना = | ज्ञानी के | कथम् = | कैसे |
| अन्तः = | अभ्यन्तर | कथ्यते = | कहा जावे ॥ |
भावार्थ ।
जो विद्वान् अपने आत्मा में तृप्त है, वह शान्त है; संसार से निराश है । जो आनन्द वह अपने अन्तःकरण में अनुभव करता है; वह उस आनन्द को लोगों के प्रति कह नहीं सकता है । क्योंकि उसके तुल्य दूसरा कोई आनन्द उसको नहीं मिलता है ।
दृष्टांत—एक कुमारी कन्या ने विवाहिता कन्या से पूछा कि पति के साथ संभोग में कैसा आनन्द है ? उसने कहा; वह आनन्द मैं कह नहीं सकती हूँ । उस आनन्द की उपमा कोई नहीं है । जब तू विवाही जावेगी; तब आप ही तू जान लेगी । क्योंकि वह स्वसंवेद्य है वैसे ज्ञानवान् का आनंद भी स्वसंवेद्य है; वह वाणी द्वारा कहा नहीं जा सकता है ॥ ९३ ॥
३६८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
मूलम् ।
सुप्तोऽपि न सुषुप्तौ च स्वप्नेऽपि शयितो न च ।
जागरेऽपि न जागर्ति धीरस्तृप्तः पदे पदे ॥ ९४ ॥
पदच्छेदः ।
सुप्तः, अपि, न, सुषुप्तौ, च, स्वप्ने, अपि, शयितः, न, च, जागरे, अपि, न, जागर्ति, धीरः, तृप्तः, पदे, पदे ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| धीरः | = ज्ञानी | अपि | = भी |
| सुषुप्तौ | = सुषुप्ति में | न | = नहीं |
| सुप्तः | = सुप्तवान् है | अपि | = भी |
| च | = और | न | = नहीं |
| स्वप्ने | = स्वप्न में | जागर्ति | = जागता है |
| अपि | = भी | अतएव | = इसी लिये |
| न | = नहीं | सः | = वह |
| शयितः | = सोया हुआ है | पदेपदे | = क्षण-क्षण में |
| च | = और | तृप्तः | = तृप्त है ॥ |
| जागरे | = जाग्रत् में |
भावार्थ ।
जीवन्मुक्त विद्वान् सुषुप्ति के होने पर भी सुषुप्तिवाला नहीं होता है। और स्वप्न अवस्था के प्राप्त होने पर भी वह स्वप्न अवस्थावाला नहीं होता है। जाग्रत् अवस्थाओं में जागता हुआ भी वह जागता नहीं है। क्योंकि तीनों अवस्थाओंवाली जो बुद्धि है; उसका वह साक्षी होकर उससे पृथक् है ॥ ९४ ॥