अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 369, कुल 405 में से
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३६२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
जीवन्मुक्त निर्विकार होकर संसार में रमण करता है, अपने पास कुछ भी नहीं रखता है । वह विधि-निषेध का किङ्कर नहीं होता है । स्वच्छन्दचारी है । अपनी इच्छा से विचरता है । सुख-दुःखादि द्वन्द्वों से वह रहित है, संशयों से भी रहित है, वह किसी पदार्थ में भी आसक्त नहीं है ॥ ८७॥
मूलम् ।
निर्ममः शोभते धीरः समलोष्टाश्मकाञ्चनः । सुभिन्नहृदयग्रन्थिर्विनिर्धूतरजस्तमः ॥ ८८ ॥
पदच्छेदः ।
निर्ममः, शोभते, धीरः, समलोष्टाश्मकाञ्चनः, सुभिन्न-हृदयग्रन्थिः, विनिर्धूतरजस्तमः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| निर्ममः = | जो ममता-रहित है | सुभिन्नहृदय-ग्रन्थिः = | टूट गई है हृदय की ग्रन्थि जिसकी |
| समलोष्टाश्म-काञ्चनः = | जिसको ढेला पत्थर और स्वर्ण समान है | निर्धूतरज-स्तमः = | धुल गया है रज और तम स्वभाव जिसका, ऐसा ज्ञानी |
| शोभते = | शोभायमान होता है ॥ |
भावार्थ ।
ममता से रहित ही जीवन्मुक्त ज्ञानी शोभा को पाता है । क्योंकि उसकी दृष्टि में पत्थर, मिट्टी और सोना