अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 368, कुल 405 में से
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अठारहवाँ प्रकरण । ३६१
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| स्वभावभूमि-विश्रान्तिवि-स्मृताशेषसंसृतेः = | जो निज स्वभाव रूपी भूमिमें विश्राम करता है, विस्मरण है संपूर्ण संसार जिसको, ऐसे | चिन्ता= | चिन्ता |
| न= | नहीं है | ||
| वा= | चाहे | ||
| देहः= | देह | ||
| महात्मनः= | महात्मा को | उदेतु= | स्थित रहें |
| अस्य= | इस बात की | वा= | चाहे |
| पततु= | नाश होवे ॥ |
भावार्थ ।
जिस विद्वान् को अपना स्वरूप ही भूमि है, अर्थात् विश्राम का स्थान है । जिसको अपने स्वरूप में विश्राम करके किसी प्रकार की भी चिन्ता नहीं होती है, चाहे, देह रहे, वा न रहे, वही जीवन्मुक्त है, वही संसार से निवृत्त है॥८६॥
मूलम् ।
अकिञ्चनः कामचारो निर्द्वन्द्वश्छिन्नसंशयः ।
असक्तः सर्वभावेषु केवलो रमते बुधः ॥ ८७ ॥
पदच्छेदः ।
अकिञ्चन, कामचारः, निर्द्वन्द्वः, छिन्नसंशयः असक्तः, सर्वभावेषु, केवलः, रमते, बुधः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अकिञ्चनः= | गृहस्थधर्म-रहित | बुधः= | ज्ञानी |
| कामचारः= | विधि-निषेध-रहित | ||
| असक्तः= | असक्ति-रहित | सर्वभावेषु= | सब भावों में |
| केवलः= | विकार-रहित | रमते= | रमण करता है ॥ |