भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 370, कुल 405 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 370

अठारहवाँ प्रकरण । ३६३

बराबर हैं । आत्म-ज्ञान के बल से उसके हृदय की ग्रन्थि टूट गई है, रज-तम-रूप मल उसके दूर हो गये हैं ॥ ८८ ॥

मूलम् ।

सर्वत्रानवधानस्य न किञ्चिद्वासना हृदि । मुक्तात्मनो वितृप्तस्य तुलना केन जायते ॥ ८९ ॥

पदच्छेदः ।

सर्वत्र, अनवधानस्य, न, किञ्चित्, वासना, हृदि; मुक्तात्मनः, वितृप्तस्य, तुलना, केन, जायते ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
सर्वत्र=सब विषयों मेंईदृशस्य=ऐसे
अनवधानस्य=आसक्ति-रहिततृप्तस्य=तृप्त हुए
हृदि=हृदय मेंमुक्तात्मनः=ज्ञानी की
किञ्चित्=कुछ भीतुलना=बराबरी
वासना=वासनाकेन=किसके साथ
=नहीं हैजायते=की जा सकती है ।

भावार्थ ।

जिस विद्वान् को किसी विषय में चित्त की रुचि नहीं है, और जिसके हृदय में किञ्चित् भी वासना नहीं है, वही अध्यास से रहित ज्ञानी है । उसकी तुलना किसी के साथ नहीं की जा सकती है, केवल ज्ञानी के साथ ही की जाती है ॥ ८९ ॥