अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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अठारहवाँ प्रकरण । ३६३
बराबर हैं । आत्म-ज्ञान के बल से उसके हृदय की ग्रन्थि टूट गई है, रज-तम-रूप मल उसके दूर हो गये हैं ॥ ८८ ॥
मूलम् ।
सर्वत्रानवधानस्य न किञ्चिद्वासना हृदि । मुक्तात्मनो वितृप्तस्य तुलना केन जायते ॥ ८९ ॥
पदच्छेदः ।
सर्वत्र, अनवधानस्य, न, किञ्चित्, वासना, हृदि; मुक्तात्मनः, वितृप्तस्य, तुलना, केन, जायते ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| सर्वत्र=सब विषयों में | ईदृशस्य=ऐसे |
| अनवधानस्य=आसक्ति-रहित | तृप्तस्य=तृप्त हुए |
| हृदि=हृदय में | मुक्तात्मनः=ज्ञानी की |
| किञ्चित्=कुछ भी | तुलना=बराबरी |
| वासना=वासना | केन=किसके साथ |
| न=नहीं है | जायते=की जा सकती है । |
भावार्थ ।
जिस विद्वान् को किसी विषय में चित्त की रुचि नहीं है, और जिसके हृदय में किञ्चित् भी वासना नहीं है, वही अध्यास से रहित ज्ञानी है । उसकी तुलना किसी के साथ नहीं की जा सकती है, केवल ज्ञानी के साथ ही की जाती है ॥ ८९ ॥