भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 371, कुल 405 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 371

३६४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

मूलम् ।

जानन्नपि न जानाति पश्यन्नपि न पश्यति ।
ब्रुवन्नपि न च ब्रूते कोऽन्यो निर्वासनादृते ॥ ९० ॥

पदच्छेदः ।

जानन्, अपि, न, जानाति, पश्यन्, अपि, न, पश्यति, ब्रुवन्, अपि, न, च, ब्रूते, कः, अन्यः, निर्वासनात्, ऋते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
निर्वासनात्=वासना-रहित पुरुष सेजानाति=जानता है
ऋते=इतरपश्यन्=देखता हुआ
अन्यः=दूसराअपि=भी
कः=कौन हैन पश्यति=नहीं देखता है
यः=जो=और
जानन्=जानता हुआब्रुवन्=बोलता हुआ
अपि=भीअपि=भी
=नहींन ब्रूते=नहीं बोलता है ।

भावार्थ ।

जीवन्मुक्त विद्वान् पदार्थों को जानता हुआ भी नहीं जानता है, देखता हुआ भी नहीं देखता है, कथन करता हुआ भी नहीं कथन करता है, लोक-दृष्टि करके जानता भी है, देखता भी है, सुनता भी है, परन्तु परमार्थ-दृष्टि करके न देखता है, न सुनता है, न बोलता है, निर्वासनिक ज्ञानी के बिना दूसरा ऐसा कौन कर सकता है, किन्तु कोई भी नहीं कर सकता है ॥ ९० ॥