अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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३६४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
मूलम् ।
जानन्नपि न जानाति पश्यन्नपि न पश्यति ।
ब्रुवन्नपि न च ब्रूते कोऽन्यो निर्वासनादृते ॥ ९० ॥
पदच्छेदः ।
जानन्, अपि, न, जानाति, पश्यन्, अपि, न, पश्यति, ब्रुवन्, अपि, न, च, ब्रूते, कः, अन्यः, निर्वासनात्, ऋते ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| निर्वासनात् | =वासना-रहित पुरुष से | जानाति | =जानता है |
| ऋते | =इतर | पश्यन् | =देखता हुआ |
| अन्यः | =दूसरा | अपि | =भी |
| कः | =कौन है | न पश्यति | =नहीं देखता है |
| यः | =जो | च | =और |
| जानन् | =जानता हुआ | ब्रुवन् | =बोलता हुआ |
| अपि | =भी | अपि | =भी |
| न | =नहीं | न ब्रूते | =नहीं बोलता है । |
भावार्थ ।
जीवन्मुक्त विद्वान् पदार्थों को जानता हुआ भी नहीं जानता है, देखता हुआ भी नहीं देखता है, कथन करता हुआ भी नहीं कथन करता है, लोक-दृष्टि करके जानता भी है, देखता भी है, सुनता भी है, परन्तु परमार्थ-दृष्टि करके न देखता है, न सुनता है, न बोलता है, निर्वासनिक ज्ञानी के बिना दूसरा ऐसा कौन कर सकता है, किन्तु कोई भी नहीं कर सकता है ॥ ९० ॥