अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 362, कुल 405 में से
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अठारहवाँ प्रकरण । ३५५
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| ज्ञानिनम् | ज्ञानी को | हि | निश्चय करके |
| न | न | अत्र | इसमें |
| स्वर्गः | स्वर्ग है | बहुना | बहुत |
| न | न | उक्तेन | कहने से |
| नरकः एव | नरक ही है | किम् | क्या प्रयोजन है |
| च | और | योगिनम् | योगी को |
| न | न | योगदृष्ट्या | योग-दृष्टि से |
| जीवन्मुक्ति एव | जीवन्मुक्ति ही | किञ्चन न | कुछ भी नहीं है ॥ |
भावार्थ । जीवन्मुक्त आत्म-ज्ञानी की दृष्टि में न स्वर्ग है, और न नरक है। **प्रश्न—**नास्तिक भी स्वर्ग-नरक को नहीं मानता है, अर्थात् नास्तिक की दृष्टि में भी न स्वर्ग है, न नरक है, तब नास्तिक में और जीवन्मुक्त में कुछ भी भेद न रहा ? **उत्तर—**नास्तिक की दृष्टि में यह लोक तो है, परन्तु परलोक नहीं है, और न उसकी दृष्टि में आत्मा ही है । वह तो केवल शून्य को ही मानता है, और ज्ञानी जीवन्मुक्त की दृष्टि में लोक-परलोक दोनों नहीं हैं, किन्तु सर्वत्र एक आत्मा ही परिपूर्ण व्यापक है । आत्मा से अतिरिक्त और कुछ भी विद्वान् की दृष्टि में नहीं है ॥ ८० ॥
मूलम् । नैव प्रार्थयते लाभं नालाभेनानुशोचति । धीरस्य शीतलं चित्तममृतेनैव पूरितम् ॥ ८१ ॥