अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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३५६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
न, एव, प्रार्थयते, लाभम्, न, अलाभेन, अनुशोचति, धीरस्य, शीतलम्, चित्तम्, अमृतेन, एव, पूरितम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| धीरस्य = | ज्ञानी का | लाभम् = | लाभ के लिये |
| चित्तम् = | चित्त | प्रार्थयते = | प्रार्थना करता है |
| अमृतेन = | अमृत से | च = | और |
| पूरितम् = | पूरित हुआ | न = | न |
| शीतलम् = | शीतल है | अलाभेन = | हानि होने से |
| अतः एव = | इसी लिये | एव = | कभी |
| न = | न | अनुशोचति = | शोच करता है ॥ |
| सः = | वह |
भावार्थ ।
जीवन्मुक्त ज्ञानी न लाभ की प्रार्थना करता है, और न अलाभ पर शोक करता है, किन्तु उसका चित्त परमानन्द-रूपी अमृत द्वारा ही तृप्त अर्थात् आनन्दित रहता है ॥ ८१ ॥
मूलम् ।
न शान्तं स्तौति निष्कामा न दुष्टमपि निन्दति ।
समदुःखसुखस्तृप्तः किञ्चित्कृत्यं न पश्यति ॥ ८२ ॥
पदच्छेदः ।
न, शान्तम्, स्तौति, निष्कामः, न, दुष्टम्, अपि, निन्दति, समदुःखसुखः, तृप्तः, किञ्चित्, कृत्यम्, न, पश्यति ॥