अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 364, कुल 405 में से
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अठारहवाँ प्रकरण । ३५७
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| निष्कामः = | कामना-रत पुरुष अर्थात् ज्ञानी | समदुःख-सुखः = | सुख और दुःख है तुल्य जिसको, ऐसा |
| शान्तम् = | शान्त पुरुष को | योगी = | योगी |
| न = | न | तृप्तः = | आनन्दित होता हुआ |
| स्तौति = | स्तुति करता है | कृत्यम् = | किये हुए कर्म को |
| अपि = | और | किञ्चित् = | कुछ भी |
| दुष्टम् = | दुष्ट पुरुष को | न = | न |
| न = | न | पश्यति = | देखता है ॥ |
| निन्दति = | निन्दा करता है |
भावार्थ ।
विद्या और कामुक कर्मों से रहित जो ज्ञानी है, वह शान्ति आदिक शुद्ध गुणों द्वारा युक्त हुए पुरुष की स्तुति नहीं करता है ।
निःस्तुतिर्निर्नमस्कारो निःस्वधाकार एव च ।
चलाचलानिकेतश्च यतिर्निष्कामुको भवेत् ॥ १ ॥
ज्ञानवान् यति किसी न स्तुति करता है, न किसी को नमस्कार करता है, न अग्नि में हवनादि करता है । वह न एक जगह वास करता है, और न वह किसी की निंदा करता है, सुख-दुःख में सम रहता है, निष्काम होने से किसी कृत्य को नहीं देखता है ॥ ८२ ॥
मूलम् ।
धीरो न द्वेष्टि संसारमात्मानं न दिदृक्षति ।
हर्षामर्षविनिर्मुक्तो न मृतो न च जीवति ॥ ८३ ॥