भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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३५८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

धीरः, न, द्वेष्टि, संसारम्, आत्मानम्, न, दिदृक्षति, हर्षामर्षविनिर्मुक्तः, न, मृतः, न, च, जीवति ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
हर्षामर्षविनिर्मुक्तः=हर्ष-रोष-रहितदिदृक्षति=देखने की इच्छा करता है ।
धीरः=ज्ञानीसः=वह
संसारम्=संसार के प्रतिन=
न=मृतः=मरा हुआ
द्वेष्टि=द्वेष करता हैच=और
च=औरन=
न=जीवति=जीवता है ॥

भावार्थ ।

जो धीर विद्वान् जीवन्मुक्त है, वह संसार के साथ द्वेष नहीं करता है । क्योंकि वह संसार को देखता ही नहीं है, अपने आत्मा को ही देखता है । और यदि संसार को देखता है, तो बाधितानुवृत्ति द्वारा देखता है । और इसीलिये वह संसार के साथ द्वेष नहीं करता है । परिपक्व अवस्था में वह आत्मा को भी नहीं देखता है । क्योंकि वह स्वयम् आत्मा-रूप है और इसी कारण वह हर्षादिकों से और जन्म-मरण से रहित है ॥ ८३ ॥

मूलम् ।

निःस्नेहः पुत्रदारादौ निष्कामो विषयेषु च । निश्चिन्तः स्वशरीरेऽपि निराशः शोभते बुधः ॥ ८४ ॥