अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 366, कुल 405 में से
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अठारहवाँ प्रकरण । ३५९
पदच्छेदः ।
निःस्नेहः, पुत्रदारादौ, निष्कामः, विषयेषु, च, निश्चिन्तः, स्वश, रीरे, अपि, निराशः, शोभते, बुधः ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| पुत्रदारादौ=पुत्र और स्त्री आदिकों में | अपि=और |
| निःस्नेहः=स्नेह-रहित | स्वशरीरे=अपने शरीर में |
| च=और | निश्चिन्तः=चिन्ता-रहित |
| विषयेषु=विषयों में | बुधः=ज्ञानी |
| निष्कामः=कामना-रहित | शोभते=शोभायमान होता है ॥ |
भावार्थ ।
विद्वान् जीवन्मुक्त निराश होकर ही शोभा को पाता है । क्योंकि स्त्री-पुत्रादि के स्नेह से वह रहित है, और इसी कारण विषयों में और भोगों में वह निष्काम है । अर्थात् अपने शरीर की स्थिति के लिये भी भोजन आदिकों की चिन्ता नहीं करता है ॥ ८४ ॥
मूलम् ।
तुष्टिः सर्वत्र धीरस्य यथापतितवर्तिनः !
स्वच्छन्दं चरतो देशान्यत्रास्तमितशायिनः ॥ ८५ ॥
पदच्छेदः ।
तुष्टिः, सर्वत्र, धीरस्य, यथापतितवर्तिनः, स्वच्छन्दम्, चरतः, देशान्, यत्र, अस्तमितशायिनः ॥