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अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

३५८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

धीरः, न, द्वेष्टि, संसारम्, आत्मानम्, न, दिदृक्षति, हर्षामर्षविनिर्मुक्तः, न, मृतः, न, च, जीवति ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
हर्षामर्षविनिर्मुक्तः=हर्ष-रोष-रहितदिदृक्षति=देखने की इच्छा करता है ।
धीरः=ज्ञानीसः=वह
संसारम्=संसार के प्रतिन=
न=मृतः=मरा हुआ
द्वेष्टि=द्वेष करता हैच=और
च=औरन=
न=जीवति=जीवता है ॥

भावार्थ ।

जो धीर विद्वान् जीवन्मुक्त है, वह संसार के साथ द्वेष नहीं करता है । क्योंकि वह संसार को देखता ही नहीं है, अपने आत्मा को ही देखता है । और यदि संसार को देखता है, तो बाधितानुवृत्ति द्वारा देखता है । और इसीलिये वह संसार के साथ द्वेष नहीं करता है । परिपक्व अवस्था में वह आत्मा को भी नहीं देखता है । क्योंकि वह स्वयम् आत्मा-रूप है और इसी कारण वह हर्षादिकों से और जन्म-मरण से रहित है ॥ ८३ ॥

मूलम् ।

निःस्नेहः पुत्रदारादौ निष्कामो विषयेषु च । निश्चिन्तः स्वशरीरेऽपि निराशः शोभते बुधः ॥ ८४ ॥

अठारहवाँ प्रकरण । ३५९

पदच्छेदः ।

निःस्नेहः, पुत्रदारादौ, निष्कामः, विषयेषु, च, निश्चिन्तः, स्वश, रीरे, अपि, निराशः, शोभते, बुधः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
पुत्रदारादौ=पुत्र और स्त्री आदिकों मेंअपि=और
निःस्नेहः=स्नेह-रहितस्वशरीरे=अपने शरीर में
च=औरनिश्चिन्तः=चिन्ता-रहित
विषयेषु=विषयों मेंबुधः=ज्ञानी
निष्कामः=कामना-रहितशोभते=शोभायमान होता है ॥

भावार्थ ।

विद्वान् जीवन्मुक्त निराश होकर ही शोभा को पाता है । क्योंकि स्त्री-पुत्रादि के स्नेह से वह रहित है, और इसी कारण विषयों में और भोगों में वह निष्काम है । अर्थात् अपने शरीर की स्थिति के लिये भी भोजन आदिकों की चिन्ता नहीं करता है ॥ ८४ ॥

मूलम् ।

तुष्टिः सर्वत्र धीरस्य यथापतितवर्तिनः !
स्वच्छन्दं चरतो देशान्यत्रास्तमितशायिनः ॥ ८५ ॥

पदच्छेदः ।

तुष्टिः, सर्वत्र, धीरस्य, यथापतितवर्तिनः, स्वच्छन्दम्, चरतः, देशान्, यत्र, अस्तमितशायिनः ॥

३६० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
यत्र = जहाँचरतः = फिरनेवाले
अस्तमितशायिनः = सूर्य अस्त होता है, वहाँ ही शयन करनेवालेधीरस्य = ज्ञानी को
यथापतितवर्तिनः = पतितवर्त्ती के समान
= औरसर्वत्र = सर्वत्र
स्वच्छन्दम् = इच्छानुसारतुष्टिः = आनन्द
देशान् = देशों मेंभवति = होता है ॥

भावार्थ ।

धीर विद्वान् को जैसे-जैसे प्रारब्धवश से पदार्थ की प्राप्ति होती है, वैसे ही वैसे वह संतुष्ट रहता है, और प्रारब्ध के वश से नाना प्रकार के देशों में, वनों में, नगरों में विचरता हुआ सर्वत्र ही तुष्ट रहता है ॥ ८५ ॥

मूलम् ।

पततूदेतु वा देहो नास्य चिन्ता महात्मनः ।
स्वभावभूमिविश्रान्तिविस्मृताशेषसंसृतेः ॥ ८६ ॥

पदच्छेदः ।

पततु, उदेतु, वा, देहः, न, अस्य, चिन्ता, महात्मनः, स्वभाव भूमि विश्रान्तिविस्मृताशेषसंसृतेः ॥

अठारहवाँ प्रकरण । ३६१

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
स्वभावभूमि-विश्रान्तिवि-स्मृताशेषसंसृतेः =जो निज स्वभाव रूपी भूमिमें विश्राम करता है, विस्मरण है संपूर्ण संसार जिसको, ऐसेचिन्ता=चिन्ता
न=नहीं है
वा=चाहे
देहः=देह
महात्मनः=महात्मा कोउदेतु=स्थित रहें
अस्य=इस बात कीवा=चाहे
पततु=नाश होवे ॥

भावार्थ ।

जिस विद्वान् को अपना स्वरूप ही भूमि है, अर्थात् विश्राम का स्थान है । जिसको अपने स्वरूप में विश्राम करके किसी प्रकार की भी चिन्ता नहीं होती है, चाहे, देह रहे, वा न रहे, वही जीवन्मुक्त है, वही संसार से निवृत्त है॥८६॥

मूलम् ।

अकिञ्चनः कामचारो निर्द्वन्द्वश्छिन्नसंशयः ।
असक्तः सर्वभावेषु केवलो रमते बुधः ॥ ८७ ॥

पदच्छेदः ।

अकिञ्चन, कामचारः, निर्द्वन्द्वः, छिन्नसंशयः असक्तः, सर्वभावेषु, केवलः, रमते, बुधः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अकिञ्चनः=गृहस्थधर्म-रहितबुधः=ज्ञानी
कामचारः=विधि-निषेध-रहित
असक्तः=असक्ति-रहितसर्वभावेषु=सब भावों में
केवलः=विकार-रहितरमते=रमण करता है ॥

३६२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

जीवन्मुक्त निर्विकार होकर संसार में रमण करता है, अपने पास कुछ भी नहीं रखता है । वह विधि-निषेध का किङ्कर नहीं होता है । स्वच्छन्दचारी है । अपनी इच्छा से विचरता है । सुख-दुःखादि द्वन्द्वों से वह रहित है, संशयों से भी रहित है, वह किसी पदार्थ में भी आसक्त नहीं है ॥ ८७॥

मूलम् ।

निर्ममः शोभते धीरः समलोष्टाश्मकाञ्चनः । सुभिन्नहृदयग्रन्थिर्विनिर्धूतरजस्तमः ॥ ८८ ॥

पदच्छेदः ।

निर्ममः, शोभते, धीरः, समलोष्टाश्मकाञ्चनः, सुभिन्न-हृदयग्रन्थिः, विनिर्धूतरजस्तमः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
निर्ममः =जो ममता-रहित हैसुभिन्नहृदय-ग्रन्थिः =टूट गई है हृदय की ग्रन्थि जिसकी
समलोष्टाश्म-काञ्चनः =जिसको ढेला पत्थर और स्वर्ण समान हैनिर्धूतरज-स्तमः =धुल गया है रज और तम स्वभाव जिसका, ऐसा ज्ञानी
शोभते =शोभायमान होता है ॥

भावार्थ ।

ममता से रहित ही जीवन्मुक्त ज्ञानी शोभा को पाता है । क्योंकि उसकी दृष्टि में पत्थर, मिट्टी और सोना

अठारहवाँ प्रकरण । ३६३

बराबर हैं । आत्म-ज्ञान के बल से उसके हृदय की ग्रन्थि टूट गई है, रज-तम-रूप मल उसके दूर हो गये हैं ॥ ८८ ॥

मूलम् ।

सर्वत्रानवधानस्य न किञ्चिद्वासना हृदि । मुक्तात्मनो वितृप्तस्य तुलना केन जायते ॥ ८९ ॥

पदच्छेदः ।

सर्वत्र, अनवधानस्य, न, किञ्चित्, वासना, हृदि; मुक्तात्मनः, वितृप्तस्य, तुलना, केन, जायते ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
सर्वत्र=सब विषयों मेंईदृशस्य=ऐसे
अनवधानस्य=आसक्ति-रहिततृप्तस्य=तृप्त हुए
हृदि=हृदय मेंमुक्तात्मनः=ज्ञानी की
किञ्चित्=कुछ भीतुलना=बराबरी
वासना=वासनाकेन=किसके साथ
=नहीं हैजायते=की जा सकती है ।

भावार्थ ।

जिस विद्वान् को किसी विषय में चित्त की रुचि नहीं है, और जिसके हृदय में किञ्चित् भी वासना नहीं है, वही अध्यास से रहित ज्ञानी है । उसकी तुलना किसी के साथ नहीं की जा सकती है, केवल ज्ञानी के साथ ही की जाती है ॥ ८९ ॥

३६४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

मूलम् ।

जानन्नपि न जानाति पश्यन्नपि न पश्यति ।
ब्रुवन्नपि न च ब्रूते कोऽन्यो निर्वासनादृते ॥ ९० ॥

पदच्छेदः ।

जानन्, अपि, न, जानाति, पश्यन्, अपि, न, पश्यति, ब्रुवन्, अपि, न, च, ब्रूते, कः, अन्यः, निर्वासनात्, ऋते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
निर्वासनात्=वासना-रहित पुरुष सेजानाति=जानता है
ऋते=इतरपश्यन्=देखता हुआ
अन्यः=दूसराअपि=भी
कः=कौन हैन पश्यति=नहीं देखता है
यः=जो=और
जानन्=जानता हुआब्रुवन्=बोलता हुआ
अपि=भीअपि=भी
=नहींन ब्रूते=नहीं बोलता है ।

भावार्थ ।

जीवन्मुक्त विद्वान् पदार्थों को जानता हुआ भी नहीं जानता है, देखता हुआ भी नहीं देखता है, कथन करता हुआ भी नहीं कथन करता है, लोक-दृष्टि करके जानता भी है, देखता भी है, सुनता भी है, परन्तु परमार्थ-दृष्टि करके न देखता है, न सुनता है, न बोलता है, निर्वासनिक ज्ञानी के बिना दूसरा ऐसा कौन कर सकता है, किन्तु कोई भी नहीं कर सकता है ॥ ९० ॥

अठारहवाँ प्रकरण । ३६५

मूलम् । भिक्षुर्वा भूपतिर्वापि यो निष्कामः स शोभते । भावेषु गलिता यस्य शोभनाऽऽशोभना मतिः ॥ ९१ ॥

पदच्छेदः । भिक्षुः, वा, भूपतिः, वा, अपि, यः, निष्कामः, सः, शोभते, भावेषु, गलिता, यस्य, शोभनाऽशोभना, मतिः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
भावेषु=सब भावों मेंयः=जो
गलिता=गलित हुई हैसः=वह
शोभनाऽऽशोभना=श्रेष्ठ, अश्रेष्ठशोभते=शोभायमान होता है
मतिः=बुद्धिवा=चाहे
यस्य=जिसकीभिक्षु=भिक्षु हो
तस्मात्=इसीलियेअपि=और
निष्कामः=कामना-रहित हैवा=चाहे
भूपतिः=राजा हो ॥

भावार्थ । जिस विद्वान् की उत्तम पदार्थों में इच्छा-बुद्धि नहीं है, और अनुत्तम पदार्थों में दोष-बुद्धि नहीं है, ऐसा जो निष्काम है, वह चाहे भिक्षुक हो, अथवा राजा हो, संसार में वही शोभा को प्राप्त होता है । राजाओं में निष्काम जनक और श्रीरामचन्द्रजी हुए हैं, जिनके यश को आज तक संसार में लोग गान करते हैं । और विरक्तों में जड़भरत, दत्तात्रेय और याज्ञवल्क्य आदि हुए हैं, जिनके शुद्ध चरित्र हस्तामल-कवत् सबकी दृष्टि में दिखाई दे रहे हैं ॥ ९१ ॥

३६६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

मूलम् । क्व स्वाच्छन्द्यं क्व संकोचः क्व वा तत्त्वविनिश्चयः ।
निर्व्याजार्जवभूतस्य चरितार्थस्य योगिनः ॥ ९२ ॥

पदच्छेदः । क्वः, स्वाच्छन्द्यम्, क्व, संकोचः, वा, तत्त्वविनिश्चयः,
निर्व्याजार्जवभूतस्य, चरितार्थस्य, योगिनः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
निर्व्याजार्जव-भूतस्य =निष्कपट और सरल-रूपस्वाच्छन्द्यम् =स्वतन्त्रता है
क्व =कहाँ
च =औरसंकोचः =संकोच है
चरितार्थस्य =यथोचितवा =अथवा
योगिनः =योगी कोक्व =कहाँ
क्व =कहाँतत्त्वविनिश्चयः =तत्त्व का निश्चय है ॥

भावार्थ । जो निष्कपट योगी है, कोमल स्वभाववाला है, आत्म-निष्ठावाला है, पूर्णार्थी है, स्वेच्छा-पूर्वक आचारवाला है, उसको संकोच कहाँ है ? और वृत्त्यादि संचरण कहाँ है ? उसको कर्तृ त्व कहाँ है ? कहीं नहीं है; क्योंकि पदार्थों में उसका अध्यास नहीं है ॥ ९२ ॥

मूलम् । आत्मविश्रान्तितृप्तेन निराशेन गतार्तिना ।
अन्तर्यदनुभूयेत तत्कथं कस्य कथ्यते ॥ ९३ ॥

अठारहवाँ प्रकरण । ३६७

पदच्छेदः ।

आत्मविश्रान्तितृप्तेन, निराशेन, गतार्तिना, अन्तः, यत्, अनुभूयेत, तत्, कथम्, कस्य, कथ्यते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
आत्मविश्रान्ति-तृप्तेन =$\Big{$ आत्मा में विश्राम कर तृप्त हुएयत् =जो
अनुभूयेत =अनुभव होता है
च =औरतत् =सो
निराशेन =आधार-रहित हुएकस्य =$\Big{$ किस याने किस अधिकारी के प्रति
गतार्त्तिना =ज्ञानी केकथम् =कैसे
अन्तः =अभ्यन्तरकथ्यते =कहा जावे ॥

भावार्थ ।

जो विद्वान् अपने आत्मा में तृप्त है, वह शान्त है; संसार से निराश है । जो आनन्द वह अपने अन्तःकरण में अनुभव करता है; वह उस आनन्द को लोगों के प्रति कह नहीं सकता है । क्योंकि उसके तुल्य दूसरा कोई आनन्द उसको नहीं मिलता है ।

दृष्टांत—एक कुमारी कन्या ने विवाहिता कन्या से पूछा कि पति के साथ संभोग में कैसा आनन्द है ? उसने कहा; वह आनन्द मैं कह नहीं सकती हूँ । उस आनन्द की उपमा कोई नहीं है । जब तू विवाही जावेगी; तब आप ही तू जान लेगी । क्योंकि वह स्वसंवेद्य है वैसे ज्ञानवान् का आनंद भी स्वसंवेद्य है; वह वाणी द्वारा कहा नहीं जा सकता है ॥ ९३ ॥

३६८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

मूलम् ।

सुप्तोऽपि न सुषुप्तौ च स्वप्नेऽपि शयितो न च ।
जागरेऽपि न जागर्ति धीरस्तृप्तः पदे पदे ॥ ९४ ॥

पदच्छेदः ।

सुप्तः, अपि, न, सुषुप्तौ, च, स्वप्ने, अपि, शयितः, न, च, जागरे, अपि, न, जागर्ति, धीरः, तृप्तः, पदे, पदे ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
धीरः= ज्ञानीअपि= भी
सुषुप्तौ= सुषुप्ति में= नहीं
सुप्तः= सुप्तवान् हैअपि= भी
= और= नहीं
स्वप्ने= स्वप्न मेंजागर्ति= जागता है
अपि= भीअतएव= इसी लिये
= नहींसः= वह
शयितः= सोया हुआ हैपदेपदे= क्षण-क्षण में
= औरतृप्तः= तृप्त है ॥
जागरे= जाग्रत् में

भावार्थ ।

जीवन्मुक्त विद्वान् सुषुप्ति के होने पर भी सुषुप्तिवाला नहीं होता है। और स्वप्न अवस्था के प्राप्त होने पर भी वह स्वप्न अवस्थावाला नहीं होता है। जाग्रत् अवस्थाओं में जागता हुआ भी वह जागता नहीं है। क्योंकि तीनों अवस्थाओंवाली जो बुद्धि है; उसका वह साक्षी होकर उससे पृथक् है ॥ ९४ ॥

अठारहवाँ प्रकरण । ३६९

मूलम् ।

ज्ञः सचिन्तोऽपिनिश्चिन्तः सेन्द्रियोऽपिनिरिन्द्रियः । सबुद्धिरपि निर्बुद्धिः साहंकारोऽनहंकृति ॥ ९५ ॥

पदच्छेदः ।

ज्ञः, सचिन्तः, अपि, निश्चिन्तः, सेन्द्रियः, अपि, निरिन्द्रियः, सबुद्धिः, अपि, निर्बुद्धिः, साहंकारः, अनहंकृतिः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
ज्ञः = ज्ञानीसबुद्धिः = बुद्धि-सहित
सचिन्तः = चिन्ता-रहितअपि = भी
अपि = भीनिर्बुद्धिः = बुद्धि-रहित है
निश्चिन्तः = चिन्ता-रहित हैसाहंकारः = अहंकार-सहित
सेन्द्रियः = इन्द्रियों-सहितअपि = भी
अपि = भीअनहंकृतिः = अहंकार-रहित है ॥
निरिन्द्रियः = इन्द्रिय-रहित है

भावार्थ ।

ज्ञानवान् जीवन्मुक्त लोगों की दृष्टि में चिन्ता-युक्त प्रतीत होता है, परन्तु वास्तव में वह चिन्ता-रहित है । लोक-दृष्टि से वह इन्द्रियों के सहित है, वास्तव में वह निरिन्द्रिय है । लोगों की दृष्टि में वह बुद्धि-युक्त प्रतीत होता है; वास्तव में वह बुद्धि-रहित है । लोगों की दृष्टि में अहंकार के सहित है, वास्तव में वह अहंकार-रहित है । क्योंकि सर्वत्र ही उसकी आत्म-दृष्टि है । जो अपने आपमें आनन्द है, वह और किसी में देखता नहीं है ॥ ९५ ॥

३७० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

मूलम् ।

न सुखी न च वा दुःखी न विरक्तो न संगवान् ।
न मुमुक्षुर्न वा मुक्तो न किञ्चिन्नच किञ्चन ॥ ९६ ॥

पदच्छेदः ।

न, सुखी, न, च, वा, दुःखी, न, विरक्तः, न, संगवान्,
न, मुमुक्षुः, न, वा, मुक्तः, न, किञ्चित्, न, च, किञ्चन ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
ज्ञानीज्ञान
संगवान्संगवान् है
सुखीसुखी है
च वाऔरमुमुक्षुःमुमुक्षु है
न वाअथवा न
दुःखीदुःखी हैमुक्तःमुक्त है
नःनकिञ्चित्न कुछ है
विरक्तःविरक्त हैन चऔर न
किञ्चनकिंचन है ॥

भावार्थ ।

जीवन्मुक्त ज्ञानी लोक-दृष्टि से तो वह विषय-भोगों द्वारा बड़ा सुखी प्रतीत होता है, परन्तु वास्तव में वह विषय जन्य सुख से रहित है और फिर लोक-दृष्टि से शारीरिकादिक रोग करके दुःखी भी प्रतीत होता है, परन्तु आत्म-दृष्टि से वह रोगादिकों से रहित ही है । क्योंकि अन्तःकरणादिकों के साथ उसका अध्यास नहीं रहा है ।

**प्रश्न—**अध्यास किसको कहते हैं ?

अठारहवाँ प्रकरण । ३७१

उत्तर-सत्यानृतवस्त्वभेदप्रतीतिरध्यासः । सत्य वस्तु और मिथ्या वस्तु की जो अभेद प्रतीति है, उसी का नाम अध्यास हैं, सो सत्य वस्तु आत्मा है, और मिथ्या वस्तु अन्तःकरण हैं, इन दोनों की अभेद प्रतीति अज्ञानी को होती है, इसी वास्ते अन्तःकरण के धर्म जो सुख-दुःखादिक हैं, उनको वह अपने में मानता है, इसी से वह सुखी-दुःखी होता है । ज्ञानी का अध्यास रहा नहीं इसी वास्ते वह सुख-दुःखादिकों को अन्तःकरण में मानता है, अपने में नहीं मानता है । इसी कारण वह सुख-दुःखादिकों से रहित ही रहता है । ऐसा जीवन्मुक्त विरक्त भी नहीं है, क्योंकि उसका विषयों में द्वेष नहीं है, और वह मुक्त भी नहीं है, क्योंकि प्रथम से ही उसको बन्ध नहीं है । यदि बन्ध होता, तब वह मुक्त भी होता । बन्ध उसको न था, न है, ज्यों का त्यों अपने आपमें स्थित है ॥ ९६ ॥

मूलम् । विक्षेपेऽपि न विक्षिप्तः समाधौ न समाधिमान् । जाड्योऽपि न जडो धन्यः पाण्डित्येऽपि न पण्डितः ॥ ९७ ॥

पदच्छेदः । विक्षेपे, अपि, न, विक्षिप्तः, समाधौ, न, समाधिमान्, जाड्यो, अपि, न, जडः, धन्यः, पाण्डित्ये, अपि, न, पण्डितः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
धन्यः=ज्ञानीन=नहीं
विक्षेपे=विक्षेप मेंविक्षिप्तः=विक्षेपवान् है
अपि=भीसमाधौ=समाधि में

३७२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

न=नहींजडः=जड़ है
समाधिमान्=समाधिवान् हैपाण्डित्ये=पंडिताई में
जाड्ये=जड़ता मेंअपि=भी
अपि=भीन=नहीं
न=नहींपण्डितः=पंडित है ॥

भावार्थ ।

संसार में ज्ञानवान् पुरुष धन्य है क्योंकि लोक-दृष्टि द्वारा उसको विक्षेप होने पर भी वह विक्षिप्त नहीं होता है । क्योंकि उसको स्वप्रकाश आत्मा का अनुभव हो रहा है, और लोक-दृष्टि करके वह समाधि में भी स्थित है । परन्तु वास्तव में वह समाधि में स्थित भी नहीं है, क्योंकि उसको कर्त्तृत्वाध्यास नहीं है । फिर वह लोक-दृष्टि द्वारा जड़ प्रतीत होता है, क्योंकि जड़ की तरह वह विचरता है । परन्तु वास्तव में वह आत्म-दृष्टि होने से जड़ नहीं है ।

फिर वह लोक-दृष्टि करके पंडित प्रतीत होता है, परन्तु वह पंडित भी नहीं है, क्योंकि उसको अभिमान नहीं है, इन्हीं हेतुओं से वह जीवन्मुक्त धन्य हैं ॥ ९७ ॥

मूलम् ।

मुक्तो यथास्थितिस्वस्थः कृतकर्त्तव्यनिर्वृतः । समः सर्वत्र वैतृष्णान्न स्मरत्यकृतं कृतम् ॥ ९८ ॥

पदच्छेदः ।

मुक्तः, यथास्थितिस्वस्थः, कृतकर्त्तव्यनिर्वृतः, समः, सर्वत्र, वैतृष्णात्, न, स्मरति, अकृतम्, कृतम् ॥

अठारहवाँ प्रकरण । ३७३

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
मुक्तः= ज्ञानीसमः= सम है
यथास्थितस्वस्थः= कर्मानुसार यथा- प्राप्ति वस्तु में स्वस्थ चित्तवाला है= और
वैतृष्ण्यात्= तृष्णा के अभाव से
अकृतम्= नहीं किए हुए
कृतकर्त्तव्यनिर्वृतः= किये हुए और करने-योग्य कर्म में संतोषवान्= और
कृतम्= किए हुए
कर्म= कर्म को
सर्वत्र= सर्वत्रन स्मरति= नहीं स्मरण करता है ॥

भावार्थ ।

जीवन्मुक्त को प्रारब्ध के वश से जैसी स्थिति प्राप्त होती है, उसी में स्वस्थचित्तवाला ही वह रहता है । वह उद्वेग को कदापि नहीं प्राप्त होता है, और पूर्व किए हुए तथा आगे करनेवाले दोनों कर्मों में संतुष्ट चित्त ही रहता है, क्योंकि उसमें हठ अर्थात् आग्रह किसी प्रकार का भी नहीं है, इसी वास्ते वह किए हुए और न किए हुए कर्मों का स्मरण भी नहीं करता है ॥ ९८ ॥

मूलम् ।

न प्रीयते वन्द्यमानो निन्द्यमानो न कुप्यति ।
नैवोद्विजति मरणे जीवने नाभिनन्दति ॥ ९९ ॥

पदच्छेदः ।

न, प्रीयते, वन्द्यमानः, निन्द्यमानः, न, कुप्यतिः, न, एव, उद्विजति, मरणे, जीवने, न, अभिनन्दति ॥

३७४अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
ज्ञानी= ज्ञानी= और
वन्द्यमानः= स्तुति किया हुआमरणे= मरण में
= नहींन व= कभी नहीं
प्रीयते= प्रसन्न होता हैउद्विजति= उद्वेग करता है
= और= और
निन्द्यमानः= निन्दा किया हुआजीवने= जीवन में
= नहीं= नहीं
कुप्यति= कोप करता हैअभिनन्दति= हर्ष करता है ॥

भावार्थ ।

जीवन्मुक्त ज्ञानी इतर पुरुषों द्वारा स्तुति को प्राप्त हुआ भी हर्ष को नहीं प्राप्त होता है, और इतर पुरुषों द्वारा निन्दा किया हुआ भी क्रोध को नहीं प्राप्त होता है; और मृत्यु के आने पर भी वह भय को भी नहीं प्राप्त होता है । क्योंकि उसकी दृष्टि में आत्मा नित्य है; जन्म-मरण कोई वस्तु नहीं है । उसको अधिक जीने की न इच्छा है, न मरने का शोक है, वह सदा एकरस है ॥ ९९ ॥

मूलम् ।

न धावति जनाकीर्णं नारण्यमुपशान्तधीः ।
यथा तथा यत्र तत्र सम एवावतिष्ठते ॥ १०० ॥

पदच्छेदः ।

न, धावति, जनाकीर्णम्, न, अरण्यम्, उपशान्तधीः, यथा, तथा, यत्र, तत्र, समः, एव, अवतिष्ठते ॥

अठारहवाँ प्रकरण । ३७५

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
उपशान्तधीः =शान्त बुद्धिवाला पुरुषअरण्यम् =वन के सम्मुख
न =धावति =दौड़ता है
जनाकीर्णम् =मनुष्यों से व्याप्त देश के सम्मुखपरन्तु =परन्तु
यत्र तत्र =जहाँ है नहीं
च =औरसमः एव =समभाव से ही
न =अवतिष्ठते =स्थित रहता है ॥

भावार्थ ।

हे शिष्य ! जो जीवन्मुक्त शान्तचित्त है, वह जनों द्वारा भरे पुरे देश को भी नहीं दौड़ता है, क्योंकि उसके साथ उसका राग नहीं, और वन की ओर भी नहीं दौड़ता है, क्योंकि मनुष्यों के साथ उसका द्वेष नहीं है, जहाँ तहाँ वन में अथवा नगर में वह स्वस्थचित्त होकर एकरस ज्यों का त्यों ही रहता है ॥ १०० ॥

इति श्रीअष्टावक्रगीताभाषाटीकायां शान्तिशतकं नामाष्टा-
दशप्रकरणं समाप्तम् ॥

—:०:—

उन्नीसवाँ प्रकरण (आत्मविश्राम)

उन्नीसवाँ प्रकरण।

—:०:—

मूलम्।

तत्त्वविज्ञानसंदंशमादाय हृदयोदरात्।
नानाविधपरामर्शशल्योद्धारः कृतो मया ॥ १ ॥

पदच्छेदः।

तत्त्वविज्ञानसंदंशम्, आदाय, हृदयोदरात्, नानाविध-परामर्शशल्योद्धारः, कृतः, मया ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
भवतः= आपसेनानाविधपरामर्शशल्योद्धारः= नाना प्रकार के विचार-रूपबाण का उद्धार
तत्त्वविज्ञानसंदंशम्= तत्त्वज्ञानरूप संसी कोमया= मुझ करके
आदाय= ले करकेकृतः= किया गया है ॥
हृदयोदरात्= हृदय और उदर से

भावार्थ।

अब एकोनविंशति प्रकरण का प्रारम्भ करते हैं—
शिष्य गुरु के मुख से तत्त्व-ज्ञानी की स्वाभाविक शान्ति को श्रवण करके, अपने को कृतार्थ मानकर, अब गुरु के तोष के लिये अपनी शान्ति को आठ श्लोकों द्वारा कहता है।
हे गुरो! मैंने आपके सकाश से तत्त्वज्ञान के उपदेश की संसीरूपी शास्त्र द्वारा अपने हृदय से नाना प्रकार के संकल्पों और विकल्पों को निकाल दिया है ॥ १ ॥

उन्नीसवाँ प्रकरण । ३७७

मूलम् ।

क्व धर्मः क्व च वा कामः क्व चार्थः क्व विवेककता ।
क्व द्वैतं क्व च वाऽद्वैतं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ २ ॥

पदच्छेदः ।

क्व, धर्मः, क्व, च, वा, कामः, क्व, च, अर्थः, क्व, विवेककता,
क्व, द्वैतम्, क्व, च, वा, अद्वैतम्, स्वमहिम्न, स्थितस्य, मे ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
स्वमहिम्नि= अपनी महिमा में= और
स्थितस्य= स्थित हुएक्व= कहाँ
मे= मुझकोअर्थः= अर्थ है ?
क्व= कहाँवा= अथवा
धर्मः= धर्म है ?क्व= कहाँ
= औरद्वैतम्= द्वैत है ?
क्व= कहाँवा= अथवा
कामः= काम है ?क्व= कहाँ
अद्वैतम्= अद्वैत है ?

भावार्थ ।

शिष्य कहता है कि मेरे को धर्म कहाँ है ? और काम कहाँ है ? मैंने धर्म, अर्थ, और काम को अपने हृदय से निकाल दिया है । क्योंकि ये सब विनाशी हैं, और जो मैं अपनी महिमा में स्थित हूँ, तो मेरे को विवेक कहाँ ? विवेक से भी मेरा कुछ प्रयोजन नहीं है, और चेतन आत्मा में जो विश्रान्ति को प्राप्त हुआ है, उसको द्वैत और अद्वैत से भी कुछ प्रयोजन नहीं है ।