भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 376, कुल 405 में से

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पृष्ठ 376

अठारहवाँ प्रकरण । ३६९

मूलम् ।

ज्ञः सचिन्तोऽपिनिश्चिन्तः सेन्द्रियोऽपिनिरिन्द्रियः । सबुद्धिरपि निर्बुद्धिः साहंकारोऽनहंकृति ॥ ९५ ॥

पदच्छेदः ।

ज्ञः, सचिन्तः, अपि, निश्चिन्तः, सेन्द्रियः, अपि, निरिन्द्रियः, सबुद्धिः, अपि, निर्बुद्धिः, साहंकारः, अनहंकृतिः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
ज्ञः = ज्ञानीसबुद्धिः = बुद्धि-सहित
सचिन्तः = चिन्ता-रहितअपि = भी
अपि = भीनिर्बुद्धिः = बुद्धि-रहित है
निश्चिन्तः = चिन्ता-रहित हैसाहंकारः = अहंकार-सहित
सेन्द्रियः = इन्द्रियों-सहितअपि = भी
अपि = भीअनहंकृतिः = अहंकार-रहित है ॥
निरिन्द्रियः = इन्द्रिय-रहित है

भावार्थ ।

ज्ञानवान् जीवन्मुक्त लोगों की दृष्टि में चिन्ता-युक्त प्रतीत होता है, परन्तु वास्तव में वह चिन्ता-रहित है । लोक-दृष्टि से वह इन्द्रियों के सहित है, वास्तव में वह निरिन्द्रिय है । लोगों की दृष्टि में वह बुद्धि-युक्त प्रतीत होता है; वास्तव में वह बुद्धि-रहित है । लोगों की दृष्टि में अहंकार के सहित है, वास्तव में वह अहंकार-रहित है । क्योंकि सर्वत्र ही उसकी आत्म-दृष्टि है । जो अपने आपमें आनन्द है, वह और किसी में देखता नहीं है ॥ ९५ ॥

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