अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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३६८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
मूलम् ।
सुप्तोऽपि न सुषुप्तौ च स्वप्नेऽपि शयितो न च ।
जागरेऽपि न जागर्ति धीरस्तृप्तः पदे पदे ॥ ९४ ॥
पदच्छेदः ।
सुप्तः, अपि, न, सुषुप्तौ, च, स्वप्ने, अपि, शयितः, न, च, जागरे, अपि, न, जागर्ति, धीरः, तृप्तः, पदे, पदे ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| धीरः | = ज्ञानी | अपि | = भी |
| सुषुप्तौ | = सुषुप्ति में | न | = नहीं |
| सुप्तः | = सुप्तवान् है | अपि | = भी |
| च | = और | न | = नहीं |
| स्वप्ने | = स्वप्न में | जागर्ति | = जागता है |
| अपि | = भी | अतएव | = इसी लिये |
| न | = नहीं | सः | = वह |
| शयितः | = सोया हुआ है | पदेपदे | = क्षण-क्षण में |
| च | = और | तृप्तः | = तृप्त है ॥ |
| जागरे | = जाग्रत् में |
भावार्थ ।
जीवन्मुक्त विद्वान् सुषुप्ति के होने पर भी सुषुप्तिवाला नहीं होता है। और स्वप्न अवस्था के प्राप्त होने पर भी वह स्वप्न अवस्थावाला नहीं होता है। जाग्रत् अवस्थाओं में जागता हुआ भी वह जागता नहीं है। क्योंकि तीनों अवस्थाओंवाली जो बुद्धि है; उसका वह साक्षी होकर उससे पृथक् है ॥ ९४ ॥