अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 374, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ प्रकरण । ३६७
पदच्छेदः ।
आत्मविश्रान्तितृप्तेन, निराशेन, गतार्तिना, अन्तः, यत्, अनुभूयेत, तत्, कथम्, कस्य, कथ्यते ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| आत्मविश्रान्ति-तृप्तेन = | $\Big{$ आत्मा में विश्राम कर तृप्त हुए | यत् = | जो |
| अनुभूयेत = | अनुभव होता है | ||
| च = | और | तत् = | सो |
| निराशेन = | आधार-रहित हुए | कस्य = | $\Big{$ किस याने किस अधिकारी के प्रति |
| गतार्त्तिना = | ज्ञानी के | कथम् = | कैसे |
| अन्तः = | अभ्यन्तर | कथ्यते = | कहा जावे ॥ |
भावार्थ ।
जो विद्वान् अपने आत्मा में तृप्त है, वह शान्त है; संसार से निराश है । जो आनन्द वह अपने अन्तःकरण में अनुभव करता है; वह उस आनन्द को लोगों के प्रति कह नहीं सकता है । क्योंकि उसके तुल्य दूसरा कोई आनन्द उसको नहीं मिलता है ।
दृष्टांत—एक कुमारी कन्या ने विवाहिता कन्या से पूछा कि पति के साथ संभोग में कैसा आनन्द है ? उसने कहा; वह आनन्द मैं कह नहीं सकती हूँ । उस आनन्द की उपमा कोई नहीं है । जब तू विवाही जावेगी; तब आप ही तू जान लेगी । क्योंकि वह स्वसंवेद्य है वैसे ज्ञानवान् का आनंद भी स्वसंवेद्य है; वह वाणी द्वारा कहा नहीं जा सकता है ॥ ९३ ॥