अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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३६६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
मूलम् ।
क्व स्वाच्छन्द्यं क्व संकोचः क्व वा तत्त्वविनिश्चयः ।
निर्व्याजार्जवभूतस्य चरितार्थस्य योगिनः ॥ ९२ ॥
पदच्छेदः ।
क्वः, स्वाच्छन्द्यम्, क्व, संकोचः, वा, तत्त्वविनिश्चयः,
निर्व्याजार्जवभूतस्य, चरितार्थस्य, योगिनः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| निर्व्याजार्जव-भूतस्य = | निष्कपट और सरल-रूप | स्वाच्छन्द्यम् = | स्वतन्त्रता है |
| क्व = | कहाँ | ||
| च = | और | संकोचः = | संकोच है |
| चरितार्थस्य = | यथोचित | वा = | अथवा |
| योगिनः = | योगी को | क्व = | कहाँ |
| क्व = | कहाँ | तत्त्वविनिश्चयः = | तत्त्व का निश्चय है ॥ |
भावार्थ । जो निष्कपट योगी है, कोमल स्वभाववाला है, आत्म-निष्ठावाला है, पूर्णार्थी है, स्वेच्छा-पूर्वक आचारवाला है, उसको संकोच कहाँ है ? और वृत्त्यादि संचरण कहाँ है ? उसको कर्तृ त्व कहाँ है ? कहीं नहीं है; क्योंकि पदार्थों में उसका अध्यास नहीं है ॥ ९२ ॥
मूलम् ।
आत्मविश्रान्तितृप्तेन निराशेन गतार्तिना ।
अन्तर्यदनुभूयेत तत्कथं कस्य कथ्यते ॥ ९३ ॥