अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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३७० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
मूलम् ।
न सुखी न च वा दुःखी न विरक्तो न संगवान् ।
न मुमुक्षुर्न वा मुक्तो न किञ्चिन्नच किञ्चन ॥ ९६ ॥
पदच्छेदः ।
न, सुखी, न, च, वा, दुःखी, न, विरक्तः, न, संगवान्,
न, मुमुक्षुः, न, वा, मुक्तः, न, किञ्चित्, न, च, किञ्चन ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| ज्ञानी | ज्ञान | न | न |
| न | न | संगवान् | संगवान् है |
| सुखी | सुखी है | न | न |
| च वा | और | मुमुक्षुः | मुमुक्षु है |
| न | न | न वा | अथवा न |
| दुःखी | दुःखी है | मुक्तः | मुक्त है |
| नः | न | नकिञ्चित् | न कुछ है |
| विरक्तः | विरक्त है | न च | और न |
| किञ्चन | किंचन है ॥ |
भावार्थ ।
जीवन्मुक्त ज्ञानी लोक-दृष्टि से तो वह विषय-भोगों द्वारा बड़ा सुखी प्रतीत होता है, परन्तु वास्तव में वह विषय जन्य सुख से रहित है और फिर लोक-दृष्टि से शारीरिकादिक रोग करके दुःखी भी प्रतीत होता है, परन्तु आत्म-दृष्टि से वह रोगादिकों से रहित ही है । क्योंकि अन्तःकरणादिकों के साथ उसका अध्यास नहीं रहा है ।
**प्रश्न—**अध्यास किसको कहते हैं ?