अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 379, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ें३७२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| न=नहीं | जडः=जड़ है |
| समाधिमान्=समाधिवान् है | पाण्डित्ये=पंडिताई में |
| जाड्ये=जड़ता में | अपि=भी |
| अपि=भी | न=नहीं |
| न=नहीं | पण्डितः=पंडित है ॥ |
भावार्थ ।
संसार में ज्ञानवान् पुरुष धन्य है क्योंकि लोक-दृष्टि द्वारा उसको विक्षेप होने पर भी वह विक्षिप्त नहीं होता है । क्योंकि उसको स्वप्रकाश आत्मा का अनुभव हो रहा है, और लोक-दृष्टि करके वह समाधि में भी स्थित है । परन्तु वास्तव में वह समाधि में स्थित भी नहीं है, क्योंकि उसको कर्त्तृत्वाध्यास नहीं है । फिर वह लोक-दृष्टि द्वारा जड़ प्रतीत होता है, क्योंकि जड़ की तरह वह विचरता है । परन्तु वास्तव में वह आत्म-दृष्टि होने से जड़ नहीं है ।
फिर वह लोक-दृष्टि करके पंडित प्रतीत होता है, परन्तु वह पंडित भी नहीं है, क्योंकि उसको अभिमान नहीं है, इन्हीं हेतुओं से वह जीवन्मुक्त धन्य हैं ॥ ९७ ॥
मूलम् ।
मुक्तो यथास्थितिस्वस्थः कृतकर्त्तव्यनिर्वृतः । समः सर्वत्र वैतृष्णान्न स्मरत्यकृतं कृतम् ॥ ९८ ॥
पदच्छेदः ।
मुक्तः, यथास्थितिस्वस्थः, कृतकर्त्तव्यनिर्वृतः, समः, सर्वत्र, वैतृष्णात्, न, स्मरति, अकृतम्, कृतम् ॥