अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 380, कुल 405 में से
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अठारहवाँ प्रकरण । ३७३
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| मुक्तः | = ज्ञानी | समः | = सम है |
| यथास्थितस्वस्थः | = कर्मानुसार यथा- प्राप्ति वस्तु में स्वस्थ चित्तवाला है | च | = और |
| वैतृष्ण्यात् | = तृष्णा के अभाव से | ||
| अकृतम् | = नहीं किए हुए | ||
| कृतकर्त्तव्यनिर्वृतः | = किये हुए और करने-योग्य कर्म में संतोषवान् | च | = और |
| कृतम् | = किए हुए | ||
| कर्म | = कर्म को | ||
| सर्वत्र | = सर्वत्र | न स्मरति | = नहीं स्मरण करता है ॥ |
भावार्थ ।
जीवन्मुक्त को प्रारब्ध के वश से जैसी स्थिति प्राप्त होती है, उसी में स्वस्थचित्तवाला ही वह रहता है । वह उद्वेग को कदापि नहीं प्राप्त होता है, और पूर्व किए हुए तथा आगे करनेवाले दोनों कर्मों में संतुष्ट चित्त ही रहता है, क्योंकि उसमें हठ अर्थात् आग्रह किसी प्रकार का भी नहीं है, इसी वास्ते वह किए हुए और न किए हुए कर्मों का स्मरण भी नहीं करता है ॥ ९८ ॥
मूलम् ।
न प्रीयते वन्द्यमानो निन्द्यमानो न कुप्यति ।
नैवोद्विजति मरणे जीवने नाभिनन्दति ॥ ९९ ॥
पदच्छेदः ।
न, प्रीयते, वन्द्यमानः, निन्द्यमानः, न, कुप्यतिः, न, एव, उद्विजति, मरणे, जीवने, न, अभिनन्दति ॥