अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अठारहवाँ प्रकरण । ३७३
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| मुक्तः | = ज्ञानी | समः | = सम है |
| यथास्थितस्वस्थः | = कर्मानुसार यथा- प्राप्ति वस्तु में स्वस्थ चित्तवाला है | च | = और |
| वैतृष्ण्यात् | = तृष्णा के अभाव से | ||
| अकृतम् | = नहीं किए हुए | ||
| कृतकर्त्तव्यनिर्वृतः | = किये हुए और करने-योग्य कर्म में संतोषवान् | च | = और |
| कृतम् | = किए हुए | ||
| कर्म | = कर्म को | ||
| सर्वत्र | = सर्वत्र | न स्मरति | = नहीं स्मरण करता है ॥ |
भावार्थ ।
जीवन्मुक्त को प्रारब्ध के वश से जैसी स्थिति प्राप्त होती है, उसी में स्वस्थचित्तवाला ही वह रहता है । वह उद्वेग को कदापि नहीं प्राप्त होता है, और पूर्व किए हुए तथा आगे करनेवाले दोनों कर्मों में संतुष्ट चित्त ही रहता है, क्योंकि उसमें हठ अर्थात् आग्रह किसी प्रकार का भी नहीं है, इसी वास्ते वह किए हुए और न किए हुए कर्मों का स्मरण भी नहीं करता है ॥ ९८ ॥
मूलम् ।
न प्रीयते वन्द्यमानो निन्द्यमानो न कुप्यति ।
नैवोद्विजति मरणे जीवने नाभिनन्दति ॥ ९९ ॥
पदच्छेदः ।
न, प्रीयते, वन्द्यमानः, निन्द्यमानः, न, कुप्यतिः, न, एव, उद्विजति, मरणे, जीवने, न, अभिनन्दति ॥
| ३७४ | अष्टावक्र-गीता भा० टी० स० |
|---|
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| ज्ञानी | = ज्ञानी | च | = और |
| वन्द्यमानः | = स्तुति किया हुआ | मरणे | = मरण में |
| न | = नहीं | न व | = कभी नहीं |
| प्रीयते | = प्रसन्न होता है | उद्विजति | = उद्वेग करता है |
| च | = और | च | = और |
| निन्द्यमानः | = निन्दा किया हुआ | जीवने | = जीवन में |
| न | = नहीं | न | = नहीं |
| कुप्यति | = कोप करता है | अभिनन्दति | = हर्ष करता है ॥ |
भावार्थ ।
जीवन्मुक्त ज्ञानी इतर पुरुषों द्वारा स्तुति को प्राप्त हुआ भी हर्ष को नहीं प्राप्त होता है, और इतर पुरुषों द्वारा निन्दा किया हुआ भी क्रोध को नहीं प्राप्त होता है; और मृत्यु के आने पर भी वह भय को भी नहीं प्राप्त होता है । क्योंकि उसकी दृष्टि में आत्मा नित्य है; जन्म-मरण कोई वस्तु नहीं है । उसको अधिक जीने की न इच्छा है, न मरने का शोक है, वह सदा एकरस है ॥ ९९ ॥
मूलम् ।
न धावति जनाकीर्णं नारण्यमुपशान्तधीः ।
यथा तथा यत्र तत्र सम एवावतिष्ठते ॥ १०० ॥
पदच्छेदः ।
न, धावति, जनाकीर्णम्, न, अरण्यम्, उपशान्तधीः, यथा, तथा, यत्र, तत्र, समः, एव, अवतिष्ठते ॥
अठारहवाँ प्रकरण । ३७५
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| उपशान्तधीः = | शान्त बुद्धिवाला पुरुष | अरण्यम् = | वन के सम्मुख |
| न = | न | धावति = | दौड़ता है |
| जनाकीर्णम् = | मनुष्यों से व्याप्त देश के सम्मुख | परन्तु = | परन्तु |
| यत्र तत्र = | जहाँ है नहीं | ||
| च = | और | समः एव = | समभाव से ही |
| न = | न | अवतिष्ठते = | स्थित रहता है ॥ |
भावार्थ ।
हे शिष्य ! जो जीवन्मुक्त शान्तचित्त है, वह जनों द्वारा भरे पुरे देश को भी नहीं दौड़ता है, क्योंकि उसके साथ उसका राग नहीं, और वन की ओर भी नहीं दौड़ता है, क्योंकि मनुष्यों के साथ उसका द्वेष नहीं है, जहाँ तहाँ वन में अथवा नगर में वह स्वस्थचित्त होकर एकरस ज्यों का त्यों ही रहता है ॥ १०० ॥
इति श्रीअष्टावक्रगीताभाषाटीकायां शान्तिशतकं नामाष्टा-
दशप्रकरणं समाप्तम् ॥
—:०:—
उन्नीसवाँ प्रकरण (आत्मविश्राम)
उन्नीसवाँ प्रकरण।
—:०:—
मूलम्।
तत्त्वविज्ञानसंदंशमादाय हृदयोदरात्।
नानाविधपरामर्शशल्योद्धारः कृतो मया ॥ १ ॥
पदच्छेदः।
तत्त्वविज्ञानसंदंशम्, आदाय, हृदयोदरात्, नानाविध-परामर्शशल्योद्धारः, कृतः, मया ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| भवतः | = आपसे | नानाविधपरामर्शशल्योद्धारः | = नाना प्रकार के विचार-रूपबाण का उद्धार |
| तत्त्वविज्ञानसंदंशम् | = तत्त्वज्ञानरूप संसी को | मया | = मुझ करके |
| आदाय | = ले करके | कृतः | = किया गया है ॥ |
| हृदयोदरात् | = हृदय और उदर से |
भावार्थ।
अब एकोनविंशति प्रकरण का प्रारम्भ करते हैं—
शिष्य गुरु के मुख से तत्त्व-ज्ञानी की स्वाभाविक शान्ति को श्रवण करके, अपने को कृतार्थ मानकर, अब गुरु के तोष के लिये अपनी शान्ति को आठ श्लोकों द्वारा कहता है।
हे गुरो! मैंने आपके सकाश से तत्त्वज्ञान के उपदेश की संसीरूपी शास्त्र द्वारा अपने हृदय से नाना प्रकार के संकल्पों और विकल्पों को निकाल दिया है ॥ १ ॥
उन्नीसवाँ प्रकरण । ३७७
मूलम् ।
क्व धर्मः क्व च वा कामः क्व चार्थः क्व विवेककता ।
क्व द्वैतं क्व च वाऽद्वैतं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ २ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, धर्मः, क्व, च, वा, कामः, क्व, च, अर्थः, क्व, विवेककता,
क्व, द्वैतम्, क्व, च, वा, अद्वैतम्, स्वमहिम्न, स्थितस्य, मे ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| स्वमहिम्नि | = अपनी महिमा में | च | = और |
| स्थितस्य | = स्थित हुए | क्व | = कहाँ |
| मे | = मुझको | अर्थः | = अर्थ है ? |
| क्व | = कहाँ | वा | = अथवा |
| धर्मः | = धर्म है ? | क्व | = कहाँ |
| च | = और | द्वैतम् | = द्वैत है ? |
| क्व | = कहाँ | वा | = अथवा |
| कामः | = काम है ? | क्व | = कहाँ |
| अद्वैतम् | = अद्वैत है ? |
भावार्थ ।
शिष्य कहता है कि मेरे को धर्म कहाँ है ? और काम कहाँ है ? मैंने धर्म, अर्थ, और काम को अपने हृदय से निकाल दिया है । क्योंकि ये सब विनाशी हैं, और जो मैं अपनी महिमा में स्थित हूँ, तो मेरे को विवेक कहाँ ? विवेक से भी मेरा कुछ प्रयोजन नहीं है, और चेतन आत्मा में जो विश्रान्ति को प्राप्त हुआ है, उसको द्वैत और अद्वैत से भी कुछ प्रयोजन नहीं है ।
३७८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
दृष्टांत-उत्तीर्णे तु गते पारे नौकायाः किं प्रयोजनम्। जब कि पुरुष नदी के परलेपार उतर जाता है, तब नौका का भी कुछ प्रयोजन नहीं रहता है। इसी तरह द्वैत का जब आत्मज्ञान करके बाध हो जाता है, तब फिर द्वैत के साथ अद्वैत का भी कुछ प्रयोजन नहीं रहता है, क्योंकि अद्वैत भी द्वैत की अपेक्षा करके कहा जाता है। जब द्वैत न रहा, तब अद्वैत कहना भी व्यर्थ ही है। इस वास्ते द्वैत और अद्वैत दोनों मेरे में नहीं हैं ॥ २ ॥
मूलम् । क्व भूतं भविष्यद्वा वर्तमानमपि क्व वा । क्व देशः क्व च वा नित्यं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ ३ ॥
पदच्छेदः । क्व, भूतम्, क्व, भविष्यत्, वा, वर्तमानम्, अपि, क्व, वा, क्व, देशः, क्व, च, वा, नित्यम्, स्वमहिम्नि, स्थितस्य, मे ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| नित्यम् | = नित्य | भविष्यत् | = भविष्यत् है ? |
| स्वमहिम्नि | = अपनी महिमा में | वा | = अथवा |
| स्थितस्य | = स्थित हुए | क्व | = कहाँ |
| मे | = मुझको | वर्तमानम् अपि | = वर्तमान भी है ? |
| क्व | = कहा | वा | = अथवा |
| भूतम् | = भूत है ? | क्व | = कहाँ |
| क्व | = कहाँ | देशः | = देश है ? |
भावार्थ । शिष्य कहता है कि हे गुरो ! काल का भी मेरे को स्फुरण
उन्नीसवाँ प्रकरण । ३७९
नहीं होता है । मेरी दृष्टि में भूत, भविष्यत्, और वर्तमान कोई नहीं हैं; और न कोई देश है । क्योंकि मैं नित्य अपनी महिमा में ही स्थित हूँ और सबमें मेरी एक आत्मदृष्टि है ॥ ३ ॥
मूलम् । क्व चात्मा क्व च वानात्मा क्व शुभं क्वाशुभं तथा । क्व चिन्ताक्व चवा ऽचिन्तास्वमहिम्निस्थितस्य मे ॥४ ॥
पदच्छेदः । क्व, च, आत्मा, क्व, च, वा, अनात्मा, क्व, शुभम्, क्व, अशुभम्, तथा, क्व, चिन्ता, क्व, च, वा, अचिन्ता, स्व- महिम्नि, स्थितस्य, मे ॥
अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । स्वमहिम्नि = अपनी महिमा में | शुभम् = शुभ है ? स्थितस्य = स्थित हुए | क्व = कहाँ मे = मुझको | अशुभम् = अशुभ है क्व = कहाँ | तथा = और आत्मा = आत्मा है ? | क्व = कहाँ च = और | चिन्ता = चिन्ता है ? वा = अथवा | वा = अथवा क्व = कहाँ | क्व = कहाँ अनात्मा = अनात्मा है ? | अचिन्ता = अचिन्ता है ? क्व = कहाँ |
भावार्थ । शिष्य कहता है कि हे गुरो ! अपनी महिमा में स्थित जो मैं हूँ, मेरी दृष्टि में आत्मा कहाँ ? और अनात्मा कहाँ
३८० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
है ? अर्थात् आत्मा और अनात्मा का व्यवहार अज्ञानी मूर्ख की दृष्टि में होता है। और शुभ कहाँ है ? और अशुभ कहाँ है ? चिन्ता और अचिन्ता कहाँ है ? किन्तु केवल चेतन ही अपनी महिमा में स्थित है ॥४॥
मूलम् ।
क्व स्वप्नः क्व सुषुप्तिर्वा क्व च जागरणं तथा । क्व तुरीयं भयं वापि स्वमहिम्निस्थितस्य मे ॥५॥
पदच्छेदः ।
क्व, स्वप्नः, क्व, सुषुप्तिः, वा, क्व, च, जागरणम्, तथा, क्व, तुरीयम्, भयम्, वा, अपि, स्वमहिम्नि, स्थितस्य, मे ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| स्वमहिम्नि | = अपनी महिमा में | तथा | = और |
| स्थितस्य | = स्थित हुए | जागरणम् | = जाग्रत् है ? |
| मे | = मुझको | क्व | = कहाँ |
| क्व | = कहाँ | तुरीयम् | = तुरीय है ? |
| स्वप्नः | = स्वप्न है ? | अपि | = और |
| च | = और | वा | = अथवा |
| वा | = अथवा | क्व | = कहाँ |
| क्व | = कहाँ | भयम् | = भय है ? |
| सुषुप्तिः | = सुषुप्ति है ? |
भावार्थ ।
हे गुरो ! मेरी दृष्टि में जाग्रत्, स्वप्न तथा सुषुप्ति ये तीनों अवस्थाएँ भी नहीं हैं; क्योंकि ये तीनों अवस्थाएँ बुद्धि के धर्म हैं, सो बुद्धि ही मिथ्या भान होती है। तुरीय अवस्था
उन्नीसवाँ प्रकरण । ३८१
कहाँ है ? और भय कहाँ है ? और अभय कहाँ है ? ये सब
अन्तःकरण के ही धर्म हैं, सो अन्तःकरण ही मिथ्या है ॥ ५ ॥
मूलम् ।
क्व दूरं क्व समीपं वा बाह्यं क्वाभ्यन्तरं क्व वा ।
क्वस्थूलंकवचवा सूक्ष्मं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ ६ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, दूरम्, क्व, समीपम्, वा, बाह्यम्, क्व, आभ्यन्तरम्,
क्व, वा, क्व, स्थूलम्, क्व, च, वा, सूक्ष्मम्, स्वमहिम्नि,
स्थितस्य, मे ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| स्वमहिम्नि | = अपनी महिमा में | समीपम् | = समीप है ? |
| स्थितस्य | = स्थित हुए | च | = और |
| मे | = मुझको | क्व | = कहाँ |
| क्व | = कहाँ | अभ्यन्तरम् | = आभ्यन्तर है ? |
| दूरम् | = दूर है ? | च | = और |
| च | = और | क्व | = कहाँ |
| क्व | = कहाँ | स्थूलम् | = स्थूल है ? |
| बाह्यम् | = बाह्य है ? | च | = और |
| च | = और | क्व | = कहाँ |
| क्व | = कहाँ | सूक्ष्मम् | = सूक्ष्म है ? |
भावार्थ ।
मेरे में दूर कहाँ है ? समीप कहाँ है ? बाह्य कहाँ है? अन्तर
३८२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
कहाँ है ? स्थूल कहाँ है ? सूक्ष्म कहाँ है ? जो सर्वत्र परिपूर्ण है, उसमें कुछ भी नहीं बनता है ॥ ६ ॥
मूलम् ।
क्व मृत्युर्जीवितं वा क्व लोकाः क्वास्य क्व लौकिकम् । क्व लयः क्व समाधिर्वा स्वमहिम्निस्थितस्य मे ॥ ७ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, मृत्युः, जीवितम, वा, क्व, लोकाः, क्व, अस्य, क्व, लौकिकम्, क्व, लयः, क्व, समाधिः, वा, स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| स्वमहिम्नि | = अपनी महिमा में | लोकाः | = भू आदि लोक है ? |
| स्थितस्य | = स्थित हुए | अस्य | = इस मुझ ज्ञानी को |
| मे | = मुझको | क्व | = कहाँ |
| क्व | = कहाँ | लौकिकम् | = लौकिक व्यवहार है ? |
| मृत्युः | = मृत्यु है ? | क्व | = कहाँ |
| वा | = अथवा | लयः | = लय है ? |
| क्व | = कहाँ | वा | = अथवा |
| जीवितम् | = जीवित है ? | क्व | = कहाँ |
| क्व | = कहाँ | समाधि | = समाधि है ? |
भावार्थ ।
मृत्यु कहाँ है ? और जीवन कहाँ है ? आत्मा तीनों कालों में एकरस ज्यों का त्यों अपनी महिमा में स्थित है । उसमें जन्म कहाँ ? मरण कहाँ ? लोक कहाँ ? लोकों में
उन्नीसवाँ प्रकरण । ३८३
होनेवाले पदार्थ कहाँ हैं ? लय कहाँ है ? और समाधि कहाँ ? अपनी महिमा में जो स्थित है, उसमें लयादिक भी तीनों कालों में नहीं है ॥ ७ ॥
मूलम् । अलं त्रिवर्गकथया योगस्य कथयाऽप्यलम् । अलं विज्ञानकथया विश्रान्तस्य ममात्मनि ॥ ८ ॥
पदच्छेदः । अलम्, त्रिवर्गकथया, योगस्य, कथया, अपि, अलम्, अलम्, विज्ञानकथया, विश्रान्तस्य, मम, आत्मनि ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| आत्मनि=आत्मा में | योगस्य=योग की |
| विश्रान्तस्य=विश्रान्त हुए | कथया=कथा से |
| मम=मुझको | अलम्=पूर्णता है |
| त्रिवर्गकथया=धर्म, अर्थ और काम की कथा से | च=और |
| अलम्=पूर्णता है ? | विज्ञानकथया=विज्ञान की कथा से भी |
| अलम्=पूर्णता है ॥ |
भावार्थ । धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इनकी कथाओं से, योग की कथाओं से विज्ञान की कथाओं से भी कुछ प्रयोजन नहीं है । क्योंकि मैं आत्मा में विश्रान्ति को प्राप्त हुआ हूँ ॥ ८ ॥
इति श्रीअष्टावक्रगीतायामेकोनविंशतिकं प्रकरणं समाप्तम् ।
—:०:—
बीसवाँ प्रकरण (जीवन्मुक्त-स्वरूप)
बीसवाँ प्रकरण ।
—:०:—
मूलम् ।
क्व भूतानि क्व देहो वा क्वेन्द्रियाणि क्व वा मनः ।
क्व शून्यं क्व च नैराश्यं मत्स्वरूपे निरञ्जने ॥ १ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, भूतानि, क्व, देहः, वा, क्व, इन्द्रियाणि, क्व, वा, मनः, क्व, शून्यम्, क्व, च, नैराश्यम्, मत्स्वरूपे, निरञ्जने ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| निरञ्जने = निरञ्जन | इन्द्रियाणि = इन्द्रियाँ हैं ? |
| मत्स्वरूपे = मेरे स्वरूप में | वा = अथवा |
| क्व = कहाँ | क्व = कहाँ |
| भूतानि = आकाशादि भूत हैं ? | मनः = मन है ? |
| क्व = कहाँ | क्व = कहाँ |
| देहः = देह है ? | शून्यम् = शून्य है ? |
| वा = अथवा | क्व = कहाँ |
| क्व = कहाँ | नैराश्यम् = आकाश का अभाव है ? ॥ |
भावार्थ ।
अब बीसवें प्रकरण का आरंभ करते हैं—
विद्वानों की स्वभाव-भूत जो जीवन्मुक्ति दशा है, उसको अब चौदह श्लोकों करके इस प्रकरण में निरूपण करते हैं—
बीसवाँ प्रकरण । ३८५
शिष्य कहता है कि संपूर्ण उपाधियों से शून्य जो मेरा स्वरूप है, उस निरञ्जन मेरे स्वरूप में पाँच भूत कहाँ हैं ? और सूक्ष्म भूतों का कार्य इन्द्रिय कहाँ हैं, और मन कहाँ हैं ?
**प्रश्न-**क्या तुम शून्य हो ?
**उत्तर-**शून्य भी मेरे में नहीं है, क्योंकि सद्रूप आत्मा में शून्य भी तीनों कालों में नहीं रह सकता है । शून्य कल्पित है । बिना अधिष्ठान के शून्य क कल्पना भी नहीं हो सकती है । इन संपूर्ण भूत इन्द्रियादिक कल्पित पदार्थों का मैं साक्षी हूँ ॥ १ ॥
मूलम् ।
क्व शास्त्रं क्वात्मविज्ञानं क्व वा निविषयं मनः ।
क्व तृप्ति क्व वितृष्णत्वं गतद्वन्द्वस्य मे सदा ॥ २ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, शास्त्रम्, क्व, आत्मविज्ञान, क्व, वा, निर्विषयम्, मनः, क्व, तृप्तिः, क्व, वितृष्णत्वम्, गतद्वन्द्वस्य, मे सदा ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| सदा=सदा | निर्विषयम्=विषय-रहित |
| गतद्वन्द्वस्य=द्वन्द्व-रहित | मनः=मन है ? |
| मे=मुझको | क्व=कहाँ |
| क्व=कहाँ | तृप्तिः=तृप्ति है ? |
| शास्त्रम्=शास्त्र है ? | वा=और |
| क्व=कहाँ | क्व=कहाँ |
| आत्मविज्ञानम्=आत्म-ज्ञान है ? | वितृष्णत्वम्=तृष्णा का अभाव है ॥ |
| क्व=कहाँ |
३८६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
हे गुरो ! मेरा शास्त्र से और शास्त्र-जन्य ज्ञान से क्या प्रयोजन है ? और आत्म-विश्रान्ति से भी मेरा क्या प्रयोजन है ? सबके गलित होने से मेरे को न विषय वासना है, निर्वासना है, न तृप्ति है, न तृष्णा है, न अद्वन्द्व है, किन्तु मैं शान्त एक रस हूँ ॥ २ ॥
मूलम् ।
क्व विद्या क्व च वाऽविद्या क्वाहं क्वेदं मम क्व वा ।
क्व बन्धः क्वचवा मोक्षः स्वरूपस्य क्व रूपिता ॥ ३ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, विद्या, क्व, च, वा, अविद्या, क्व, अहम्, क्व, इदम्, मम, क्व, वा, क्व, बन्धः, क्व, च, वा, मोक्षः, स्वरूपस्य, क्व, रूपिता ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| स्वरूपस्य=मेरे रूप को | क्व=कहाँ |
| क्व=कहाँ | इदम्=यह बाह्य वस्तु है ? |
| रूपिता=रूपिता है ? | वा=अथवा |
| क्व=कहाँ | क्व=कहाँ |
| विद्या=विद्या है ? | मम=मेरा है ? |
| च=और | वा=अथवा |
| क्व=कहाँ | क्व=कहाँ |
| अविद्या=अविद्या है ? | बन्धः=बन्ध है । |
| क्व=कहाँ | च=और |
| अहम्=अहंकार है ? | क्व=कहाँ |
| वा=और | मोक्षः=मोक्ष है ॥ |
बीसवाँ प्रकरण । ३८७
भावार्थ । मेरे में अविद्या आदिक धर्म कहाँ हैं ? अहंकार कहाँ है ? वाह्य वस्तु कहाँ है ? ज्ञान कहाँ है ? मेरा किसके साथ सम्बन्ध है ? सम्बन्ध दूसरे के साथ होता है, दूसरा न होने से मैं सम्बन्ध-रहित हूँ । बन्ध और मोक्ष धर्म भी मेरे में नहीं हैं । मेरे निर्विशेष स्वरूप में धर्म की वार्ता भी कोई नहीं है, और निर्धर्मक मेरे स्वरूप में विद्या आदिक कोई भी धर्म नहीं है ॥ ३ ॥
मूलम् । क्व प्रारब्धानि कर्माणि जीवन्मुक्तिरपि क्व वा । क्व तद्विदेहकैवल्यं निर्विशेषस्य सर्वदा ॥ ४ ॥
पदच्छेदः । क्व, प्रारब्धानि, कर्माणि, जीवन्मुक्तिः, अपि, क्व, वा, क्व, तत्, विदेहकैवल्यम्, निर्विशेषस्य, सर्वदा ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| सर्वदा= | सर्वदा | वा= | अथवा |
| निर्विशेषस्य= | निर्विशेष अर्थात् धर्माधर्म-रहित | क्व= | कहाँ |
| जीवन्मुक्तिः= | जीवन्मुक्ति है ? | ||
| मे= | मुझको | च= | और |
| क्व= | कहाँ | क्व= | कहाँ |
| प्रारब्धानि= | प्रारब्ध | तद्विदेहकैव- | वह विदेहमुक्ति भी है ? ॥ |
| कर्माणि= | कर्म है ? | ल्यम्अपि= |
भावार्थ । शिष्य कहता है कि हे गुरो ! मुझ निर्विशेष, निराकार,
३८८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
निरवयव आत्मा का प्रारब्ध-कर्म कहाँ है ? जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्ति कहाँ है, किन्तु कोई भी वास्तव में नहीं है ॥४॥
मूलम् । क्व कर्ता क्व च वा भोक्ता निष्क्रियं स्फुरणं क्व वा । क्वापरोक्षं फलं वा क्वा निःस्वभावस्य मे सदा ॥ ५ ॥
पदच्छेदः । क्व, कर्ता, क्व, च, वा, भोक्ता, निष्क्रियम्, स्फुरणम्, क्व, वा, क्व, अपरोक्षम्, फलम्, वा, क्व, निःस्वभावस्य, मे, सदा ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| सदा = सदा | निष्क्रियम् = क्रिया-रहित है ? |
| निःस्वभावस्य = स्वभाव-रहित | वा = अथवा |
| मे = मुझको | क्व = कहाँ |
| क्व = कहाँ | स्फुरणम् = स्फुरण है ? |
| कर्ता = कर्तापना है ? | वा = अथवा |
| च = और | क्व = कहाँ |
| क्व = कहाँ | अपरोक्षम् = प्रत्यक्ष ज्ञान है ? |
| भोक्ता = भोक्तापना है ? | वा = अथवा |
| वा = अथवा | क्व = कहाँ |
| क्व = कहाँ | फलम् = { विषयाकारवृत्त्य- <br> { वच्छिन्न चेतन है ॥ |
भावार्थ । जो मैं स्वभाव से रहित हूँ उस मेरे में कर्तृत्वकर्म कहाँ है ? और भोक्तृत्वकर्म कहाँ है ? अर्थात् कर्तापना और भोक्तापना दोनों मेरे में नहीं हैं । क्योंकि क्रिया से
बीसवाँ प्रकरण । ३८९
रहित मुझ आत्माऽऽनन्द में कर्तृत्व और भोक्तृत्व दोनों नहीं बनते हैं। इसी वास्ते वृत्ति-रूप ज्ञान भी मेरे में नहीं है। क्योंकि चित्त के स्फुरण से वृत्ति-रूप ज्ञान उत्पन्न होता है, सो चित्त का स्फुरण भी मेरे में नहीं है ॥ ५ ॥
मूलम् ।
क्व लोकः क्वमुमुक्षुर्वा क्व योगी ज्ञानवान् क्व वा । क्व बद्धः क्व च वा मुक्तः स्वस्वरूपेऽहमद्वये ॥ ६ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, लोकः, क्व, मुमुक्षुः, वा, क्व, योगी, ज्ञानवान्, क्व, वा, क्व, बद्धः, क्व, च, वा, मुक्तः, स्वस्वरूपे, अहम्, अद्वये ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| अहम् = आत्म-रूप | योगी = योगी है ? |
| अद्वये = अद्वैत | क्व = कहाँ |
| स्वस्वरूपे = अपने स्वरूप में | ज्ञानवान् = ज्ञानवान् है ? |
| क्व = कहाँ | वा = अथवा |
| लोकः = लोक है ? | क्व = कहाँ |
| क्व = कहाँ | बद्धः = बद्ध है ? |
| मुमुक्षुः = मुमुक्षु है ? | च = और |
| वा = अथवा | वा = अथवा |
| क्व = कहाँ | क्व = कहाँ |
| मुक्तः = मुक्त है ? ॥ |
भावार्थ ।
अद्वैत आत्मा में भूरादि लोक कहाँ हैं ? अर्थात् कहीं नहीं हैं।
३९० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
और लोकों के अभाव होने से मुमुक्षु भी नहीं हैं । मुमुक्षु के अभाव होने से ज्ञानवान् योगी भी नहीं है । ऐसा होने से न कोई बद्ध है ? और न कोई मुक्त है ? केवल अद्वैत आत्मा ही है ॥ ६ ॥
मूलम् । क्व सृष्टिः क्व च संहारः क्व साध्यं क्व च साधनम् । क्व साधकः क्व सिद्धिर्वा स्वस्वरूपेऽहमद्वये ॥ ७ ॥
पदच्छेदः । क्व, सृष्टिः, क्व, च, संहारः, क्व, साध्यम्, क्व, च, साधनम्, क्व, साधकः, क्व, सिद्धिः, वा, स्वस्वरूपे, अहम्, अद्वये ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| अहम्=आत्मा-स्वरूप | साध्यम्=साध्य है |
| अद्वये=अद्वैत | च=और |
| स्वस्वरूपे=अपने स्वरूप में | क्व=कहाँ |
| क्व=कहाँ | साधनम्=साधन है ? |
| सृष्टिः=सृष्टि | क्व=कहाँ |
| च=और | साधकः=साधक है ? |
| क्व=कहाँ | वा=और |
| संहारः=संहार है ? | क्व=कहाँ |
| क्व=कहाँ | सिद्धिः=सिद्धि है ॥ |
भावार्थ । सृष्टि कहाँ ? प्रलय कहाँ ? साध्य कहाँ ? साधन कहाँ ? साधक कहाँ ? और सिद्धि कहाँ । अर्थात् इनमें से कोई भी मुझ अद्वैत-स्वरूप आत्मा में नहीं है ॥ ७ ॥
बीसवाँ प्रकरण । ३९१
मूलम् ।
क्वप्रमाता प्रमाणं वा क्व प्रमेयं क्व च प्रमा ।
क्व किञ्चित्क्व न किञ्चिद्वा सर्वदा विमलस्य मे ॥ ८ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, प्रमाता, प्रमाणम्, वा, क्व, प्रमेयम्, क्व, च, प्रमा,
क्व, किञ्चित्, क्व, न, किञ्चित्, वा, सर्वदा, विमलस्य, मे ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| सर्वदा | = सर्वदा | प्रमेयम् | = प्रमेय है ? |
| विमलस्य | = निर्मल-रूप | च | = और |
| मे | = मुझको | क्व | = कहाँ |
| क्व | = कहाँ | प्रमा | = प्रमा है ? |
| प्रमाता | = प्रमाता है ? | क्व | = कहाँ |
| वा | = और | किञ्चित् | = किंचित् है ? |
| क्व | = कहाँ | वा | = और |
| प्रमाणम् | = प्रमाण है ? | क्व | = कहाँ |
| च | = और | न किञ्चित् | = अकिंचन है ॥ |
| क्व | = कहाँ |
भावार्थ ।
सर्वदा जो उपाधि-रूपी मल से रहित है, अर्थात् जिसमें उपाधि शरीरादिक वास्तव में नहीं हैं । उसमें प्रमातापना, प्रमाणपना और प्रमेयपना कहाँ हो सकता है । अर्थात् प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय ये तीनों अज्ञान के कार्य हैं । जब स्वप्रकाश चेतन में अज्ञान की संभावना मात्र भी नहीं है तब उसके कार्यों की संभावना कैसे हो सकती है, किन्तु कदापि
३९२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
नहीं हो सकती है । और प्रभा जो वृत्तिज्ञान है, वह भी नहीं है । क्योंकि वृत्ति-ज्ञान अन्तःकरण का धर्म है, सो अन्तःकरण ही उस में नहीं है । वह शुद्ध-स्वरूप आत्मा है ॥ ८ ॥
मूलम् ।
क्व विक्षेपः क्व चैकाग्र्यं क्व निर्बोधः क्व मूढ़ता । क्व हर्षः क्व विषादो वा सर्वदा निष्क्रियस्य मे ॥ ९ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, च, एषः, व्यवहारः, वा, क्व, च, सा, परमार्थता, क्व, सुखम्, क्व, च, वा, दुःखम्, निर्विमर्शस्य, मे, सदा ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| सर्वदा | = सर्वदा | निर्बोधः | = ज्ञान है ? |
| निष्क्रियस्य | = क्रिया-रहित | क्व | = कहाँ |
| मे | = मुझको | मूढ़ता | = मूढ़ता है ? |
| क्व | = कहाँ | क्व | = कहाँ |
| विक्षेपः | = विक्षेप है | हर्षः | = हर्ष है ? |
| च | = और | वा | = और |
| क्व | = कहाँ | क्व | = कहाँ |
| एकाग्रयम् | = एकाग्रता है ? | विषादः | = शोक है ? |
| क्व | = कहाँ |
भावार्थ ।
शिष्य कहतां है कि हे गुरो ! सर्वदा क्रिया से रहित जो मेरा स्वरूप है, उसमें एकाग्रता कहाँ है ? जहाँ पर प्रथम विक्षेप होता है वहाँ पर विक्षेप की निवृत्ति के लिये एकाग्रता