अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 386, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ प्रकरण । ३७९
नहीं होता है । मेरी दृष्टि में भूत, भविष्यत्, और वर्तमान कोई नहीं हैं; और न कोई देश है । क्योंकि मैं नित्य अपनी महिमा में ही स्थित हूँ और सबमें मेरी एक आत्मदृष्टि है ॥ ३ ॥
मूलम् । क्व चात्मा क्व च वानात्मा क्व शुभं क्वाशुभं तथा । क्व चिन्ताक्व चवा ऽचिन्तास्वमहिम्निस्थितस्य मे ॥४ ॥
पदच्छेदः । क्व, च, आत्मा, क्व, च, वा, अनात्मा, क्व, शुभम्, क्व, अशुभम्, तथा, क्व, चिन्ता, क्व, च, वा, अचिन्ता, स्व- महिम्नि, स्थितस्य, मे ॥
अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । स्वमहिम्नि = अपनी महिमा में | शुभम् = शुभ है ? स्थितस्य = स्थित हुए | क्व = कहाँ मे = मुझको | अशुभम् = अशुभ है क्व = कहाँ | तथा = और आत्मा = आत्मा है ? | क्व = कहाँ च = और | चिन्ता = चिन्ता है ? वा = अथवा | वा = अथवा क्व = कहाँ | क्व = कहाँ अनात्मा = अनात्मा है ? | अचिन्ता = अचिन्ता है ? क्व = कहाँ |
भावार्थ । शिष्य कहता है कि हे गुरो ! अपनी महिमा में स्थित जो मैं हूँ, मेरी दृष्टि में आत्मा कहाँ ? और अनात्मा कहाँ