अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 387, कुल 405 में से
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३८० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
है ? अर्थात् आत्मा और अनात्मा का व्यवहार अज्ञानी मूर्ख की दृष्टि में होता है। और शुभ कहाँ है ? और अशुभ कहाँ है ? चिन्ता और अचिन्ता कहाँ है ? किन्तु केवल चेतन ही अपनी महिमा में स्थित है ॥४॥
मूलम् ।
क्व स्वप्नः क्व सुषुप्तिर्वा क्व च जागरणं तथा । क्व तुरीयं भयं वापि स्वमहिम्निस्थितस्य मे ॥५॥
पदच्छेदः ।
क्व, स्वप्नः, क्व, सुषुप्तिः, वा, क्व, च, जागरणम्, तथा, क्व, तुरीयम्, भयम्, वा, अपि, स्वमहिम्नि, स्थितस्य, मे ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| स्वमहिम्नि | = अपनी महिमा में | तथा | = और |
| स्थितस्य | = स्थित हुए | जागरणम् | = जाग्रत् है ? |
| मे | = मुझको | क्व | = कहाँ |
| क्व | = कहाँ | तुरीयम् | = तुरीय है ? |
| स्वप्नः | = स्वप्न है ? | अपि | = और |
| च | = और | वा | = अथवा |
| वा | = अथवा | क्व | = कहाँ |
| क्व | = कहाँ | भयम् | = भय है ? |
| सुषुप्तिः | = सुषुप्ति है ? |
भावार्थ ।
हे गुरो ! मेरी दृष्टि में जाग्रत्, स्वप्न तथा सुषुप्ति ये तीनों अवस्थाएँ भी नहीं हैं; क्योंकि ये तीनों अवस्थाएँ बुद्धि के धर्म हैं, सो बुद्धि ही मिथ्या भान होती है। तुरीय अवस्था