अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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उन्नीसवाँ प्रकरण । ३८३
होनेवाले पदार्थ कहाँ हैं ? लय कहाँ है ? और समाधि कहाँ ? अपनी महिमा में जो स्थित है, उसमें लयादिक भी तीनों कालों में नहीं है ॥ ७ ॥
मूलम् । अलं त्रिवर्गकथया योगस्य कथयाऽप्यलम् । अलं विज्ञानकथया विश्रान्तस्य ममात्मनि ॥ ८ ॥
पदच्छेदः । अलम्, त्रिवर्गकथया, योगस्य, कथया, अपि, अलम्, अलम्, विज्ञानकथया, विश्रान्तस्य, मम, आत्मनि ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| आत्मनि=आत्मा में | योगस्य=योग की |
| विश्रान्तस्य=विश्रान्त हुए | कथया=कथा से |
| मम=मुझको | अलम्=पूर्णता है |
| त्रिवर्गकथया=धर्म, अर्थ और काम की कथा से | च=और |
| अलम्=पूर्णता है ? | विज्ञानकथया=विज्ञान की कथा से भी |
| अलम्=पूर्णता है ॥ |
भावार्थ । धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इनकी कथाओं से, योग की कथाओं से विज्ञान की कथाओं से भी कुछ प्रयोजन नहीं है । क्योंकि मैं आत्मा में विश्रान्ति को प्राप्त हुआ हूँ ॥ ८ ॥
इति श्रीअष्टावक्रगीतायामेकोनविंशतिकं प्रकरणं समाप्तम् ।
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