भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 391, कुल 405 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 391

बीसवाँ प्रकरण ।

—:०:—

मूलम् ।

क्व भूतानि क्व देहो वा क्वेन्द्रियाणि क्व वा मनः ।
क्व शून्यं क्व च नैराश्यं मत्स्वरूपे निरञ्जने ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

क्व, भूतानि, क्व, देहः, वा, क्व, इन्द्रियाणि, क्व, वा, मनः, क्व, शून्यम्, क्व, च, नैराश्यम्, मत्स्वरूपे, निरञ्जने ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
निरञ्जने = निरञ्जनइन्द्रियाणि = इन्द्रियाँ हैं ?
मत्स्वरूपे = मेरे स्वरूप मेंवा = अथवा
क्व = कहाँक्व = कहाँ
भूतानि = आकाशादि भूत हैं ?मनः = मन है ?
क्व = कहाँक्व = कहाँ
देहः = देह है ?शून्यम् = शून्य है ?
वा = अथवाक्व = कहाँ
क्व = कहाँनैराश्यम् = आकाश का अभाव है ? ॥

भावार्थ ।

अब बीसवें प्रकरण का आरंभ करते हैं—
विद्वानों की स्वभाव-भूत जो जीवन्मुक्ति दशा है, उसको अब चौदह श्लोकों करके इस प्रकरण में निरूपण करते हैं—

अष्टावक्र गीता · पृष्ठ 391, कुल 405 में से · BharatKosha