अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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बीसवाँ प्रकरण ।
—:०:—
मूलम् ।
क्व भूतानि क्व देहो वा क्वेन्द्रियाणि क्व वा मनः ।
क्व शून्यं क्व च नैराश्यं मत्स्वरूपे निरञ्जने ॥ १ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, भूतानि, क्व, देहः, वा, क्व, इन्द्रियाणि, क्व, वा, मनः, क्व, शून्यम्, क्व, च, नैराश्यम्, मत्स्वरूपे, निरञ्जने ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| निरञ्जने = निरञ्जन | इन्द्रियाणि = इन्द्रियाँ हैं ? |
| मत्स्वरूपे = मेरे स्वरूप में | वा = अथवा |
| क्व = कहाँ | क्व = कहाँ |
| भूतानि = आकाशादि भूत हैं ? | मनः = मन है ? |
| क्व = कहाँ | क्व = कहाँ |
| देहः = देह है ? | शून्यम् = शून्य है ? |
| वा = अथवा | क्व = कहाँ |
| क्व = कहाँ | नैराश्यम् = आकाश का अभाव है ? ॥ |
भावार्थ ।
अब बीसवें प्रकरण का आरंभ करते हैं—
विद्वानों की स्वभाव-भूत जो जीवन्मुक्ति दशा है, उसको अब चौदह श्लोकों करके इस प्रकरण में निरूपण करते हैं—