भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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पृष्ठ 392

बीसवाँ प्रकरण । ३८५

शिष्य कहता है कि संपूर्ण उपाधियों से शून्य जो मेरा स्वरूप है, उस निरञ्जन मेरे स्वरूप में पाँच भूत कहाँ हैं ? और सूक्ष्म भूतों का कार्य इन्द्रिय कहाँ हैं, और मन कहाँ हैं ?

**प्रश्न-**क्या तुम शून्य हो ?

**उत्तर-**शून्य भी मेरे में नहीं है, क्योंकि सद्रूप आत्मा में शून्य भी तीनों कालों में नहीं रह सकता है । शून्य कल्पित है । बिना अधिष्ठान के शून्य क कल्पना भी नहीं हो सकती है । इन संपूर्ण भूत इन्द्रियादिक कल्पित पदार्थों का मैं साक्षी हूँ ॥ १ ॥

मूलम् ।

क्व शास्त्रं क्वात्मविज्ञानं क्व वा निविषयं मनः ।
क्व तृप्ति क्व वितृष्णत्वं गतद्वन्द्वस्य मे सदा ॥ २ ॥

पदच्छेदः ।

क्व, शास्त्रम्, क्व, आत्मविज्ञान, क्व, वा, निर्विषयम्, मनः, क्व, तृप्तिः, क्व, वितृष्णत्वम्, गतद्वन्द्वस्य, मे सदा ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
सदा=सदानिर्विषयम्=विषय-रहित
गतद्वन्द्वस्य=द्वन्द्व-रहितमनः=मन है ?
मे=मुझकोक्व=कहाँ
क्व=कहाँतृप्तिः=तृप्ति है ?
शास्त्रम्=शास्त्र है ?वा=और
क्व=कहाँक्व=कहाँ
आत्मविज्ञानम्=आत्म-ज्ञान है ?वितृष्णत्वम्=तृष्णा का अभाव है ॥
क्व=कहाँ