अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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३८६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
हे गुरो ! मेरा शास्त्र से और शास्त्र-जन्य ज्ञान से क्या प्रयोजन है ? और आत्म-विश्रान्ति से भी मेरा क्या प्रयोजन है ? सबके गलित होने से मेरे को न विषय वासना है, निर्वासना है, न तृप्ति है, न तृष्णा है, न अद्वन्द्व है, किन्तु मैं शान्त एक रस हूँ ॥ २ ॥
मूलम् ।
क्व विद्या क्व च वाऽविद्या क्वाहं क्वेदं मम क्व वा ।
क्व बन्धः क्वचवा मोक्षः स्वरूपस्य क्व रूपिता ॥ ३ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, विद्या, क्व, च, वा, अविद्या, क्व, अहम्, क्व, इदम्, मम, क्व, वा, क्व, बन्धः, क्व, च, वा, मोक्षः, स्वरूपस्य, क्व, रूपिता ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| स्वरूपस्य=मेरे रूप को | क्व=कहाँ |
| क्व=कहाँ | इदम्=यह बाह्य वस्तु है ? |
| रूपिता=रूपिता है ? | वा=अथवा |
| क्व=कहाँ | क्व=कहाँ |
| विद्या=विद्या है ? | मम=मेरा है ? |
| च=और | वा=अथवा |
| क्व=कहाँ | क्व=कहाँ |
| अविद्या=अविद्या है ? | बन्धः=बन्ध है । |
| क्व=कहाँ | च=और |
| अहम्=अहंकार है ? | क्व=कहाँ |
| वा=और | मोक्षः=मोक्ष है ॥ |