भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 394, कुल 405 में से

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पृष्ठ 394

बीसवाँ प्रकरण । ३८७

भावार्थ । मेरे में अविद्या आदिक धर्म कहाँ हैं ? अहंकार कहाँ है ? वाह्य वस्तु कहाँ है ? ज्ञान कहाँ है ? मेरा किसके साथ सम्बन्ध है ? सम्बन्ध दूसरे के साथ होता है, दूसरा न होने से मैं सम्बन्ध-रहित हूँ । बन्ध और मोक्ष धर्म भी मेरे में नहीं हैं । मेरे निर्विशेष स्वरूप में धर्म की वार्ता भी कोई नहीं है, और निर्धर्मक मेरे स्वरूप में विद्या आदिक कोई भी धर्म नहीं है ॥ ३ ॥

मूलम् । क्व प्रारब्धानि कर्माणि जीवन्मुक्तिरपि क्व वा । क्व तद्विदेहकैवल्यं निर्विशेषस्य सर्वदा ॥ ४ ॥

पदच्छेदः । क्व, प्रारब्धानि, कर्माणि, जीवन्मुक्तिः, अपि, क्व, वा, क्व, तत्, विदेहकैवल्यम्, निर्विशेषस्य, सर्वदा ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
सर्वदा=सर्वदावा=अथवा
निर्विशेषस्य=निर्विशेष अर्थात् धर्माधर्म-रहितक्व=कहाँ
जीवन्मुक्तिः=जीवन्मुक्ति है ?
मे=मुझकोच=और
क्व=कहाँक्व=कहाँ
प्रारब्धानि=प्रारब्धतद्विदेहकैव-वह विदेहमुक्ति भी है ? ॥
कर्माणि=कर्म है ?ल्यम्‌अपि=

भावार्थ । शिष्य कहता है कि हे गुरो ! मुझ निर्विशेष, निराकार,

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