भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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३८८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

निरवयव आत्मा का प्रारब्ध-कर्म कहाँ है ? जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्ति कहाँ है, किन्तु कोई भी वास्तव में नहीं है ॥४॥

मूलम् । क्व कर्ता क्व च वा भोक्ता निष्क्रियं स्फुरणं क्व वा । क्वापरोक्षं फलं वा क्वा निःस्वभावस्य मे सदा ॥ ५ ॥

पदच्छेदः । क्व, कर्ता, क्व, च, वा, भोक्ता, निष्क्रियम्, स्फुरणम्, क्व, वा, क्व, अपरोक्षम्, फलम्, वा, क्व, निःस्वभावस्य, मे, सदा ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
सदा = सदानिष्क्रियम् = क्रिया-रहित है ?
निःस्वभावस्य = स्वभाव-रहितवा = अथवा
मे = मुझकोक्व = कहाँ
क्व = कहाँस्फुरणम् = स्फुरण है ?
कर्ता = कर्तापना है ?वा = अथवा
च = औरक्व = कहाँ
क्व = कहाँअपरोक्षम् = प्रत्यक्ष ज्ञान है ?
भोक्ता = भोक्तापना है ?वा = अथवा
वा = अथवाक्व = कहाँ
क्व = कहाँफलम् = { विषयाकारवृत्त्य- <br>          { वच्छिन्न चेतन है ॥

भावार्थ । जो मैं स्वभाव से रहित हूँ उस मेरे में कर्तृत्वकर्म कहाँ है ? और भोक्तृत्वकर्म कहाँ है ? अर्थात् कर्तापना और भोक्तापना दोनों मेरे में नहीं हैं । क्योंकि क्रिया से