भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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पृष्ठ 396

बीसवाँ प्रकरण । ३८९

रहित मुझ आत्माऽऽनन्द में कर्तृत्व और भोक्तृत्व दोनों नहीं बनते हैं। इसी वास्ते वृत्ति-रूप ज्ञान भी मेरे में नहीं है। क्योंकि चित्त के स्फुरण से वृत्ति-रूप ज्ञान उत्पन्न होता है, सो चित्त का स्फुरण भी मेरे में नहीं है ॥ ५ ॥

मूलम् ।

क्व लोकः क्वमुमुक्षुर्वा क्व योगी ज्ञानवान् क्व वा । क्व बद्धः क्व च वा मुक्तः स्वस्वरूपेऽहमद्वये ॥ ६ ॥

पदच्छेदः ।

क्व, लोकः, क्व, मुमुक्षुः, वा, क्व, योगी, ज्ञानवान्, क्व, वा, क्व, बद्धः, क्व, च, वा, मुक्तः, स्वस्वरूपे, अहम्, अद्वये ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
अहम् = आत्म-रूपयोगी = योगी है ?
अद्वये = अद्वैतक्व = कहाँ
स्वस्वरूपे = अपने स्वरूप मेंज्ञानवान् = ज्ञानवान् है ?
क्व = कहाँवा = अथवा
लोकः = लोक है ?क्व = कहाँ
क्व = कहाँबद्धः = बद्ध है ?
मुमुक्षुः = मुमुक्षु है ?च = और
वा = अथवावा = अथवा
क्व = कहाँक्व = कहाँ
मुक्तः = मुक्त है ? ॥

भावार्थ ।

अद्वैत आत्मा में भूरादि लोक कहाँ हैं ? अर्थात् कहीं नहीं हैं।