भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 397, कुल 405 में से

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पृष्ठ 397

३९० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

और लोकों के अभाव होने से मुमुक्षु भी नहीं हैं । मुमुक्षु के अभाव होने से ज्ञानवान् योगी भी नहीं है । ऐसा होने से न कोई बद्ध है ? और न कोई मुक्त है ? केवल अद्वैत आत्मा ही है ॥ ६ ॥

मूलम् । क्व सृष्टिः क्व च संहारः क्व साध्यं क्व च साधनम् । क्व साधकः क्व सिद्धिर्वा स्वस्वरूपेऽहमद्वये ॥ ७ ॥

पदच्छेदः । क्व, सृष्टिः, क्व, च, संहारः, क्व, साध्यम्, क्व, च, साधनम्, क्व, साधकः, क्व, सिद्धिः, वा, स्वस्वरूपे, अहम्, अद्वये ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
अहम्=आत्मा-स्वरूपसाध्यम्=साध्य है
अद्वये=अद्वैत=और
स्वस्वरूपे=अपने स्वरूप मेंक्व=कहाँ
क्व=कहाँसाधनम्=साधन है ?
सृष्टिः=सृष्टिक्व=कहाँ
=औरसाधकः=साधक है ?
क्व=कहाँवा=और
संहारः=संहार है ?क्व=कहाँ
क्व=कहाँसिद्धिः=सिद्धि है ॥

भावार्थ । सृष्टि कहाँ ? प्रलय कहाँ ? साध्य कहाँ ? साधन कहाँ ? साधक कहाँ ? और सिद्धि कहाँ । अर्थात् इनमें से कोई भी मुझ अद्वैत-स्वरूप आत्मा में नहीं है ॥ ७ ॥

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