अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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३९० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
और लोकों के अभाव होने से मुमुक्षु भी नहीं हैं । मुमुक्षु के अभाव होने से ज्ञानवान् योगी भी नहीं है । ऐसा होने से न कोई बद्ध है ? और न कोई मुक्त है ? केवल अद्वैत आत्मा ही है ॥ ६ ॥
मूलम् । क्व सृष्टिः क्व च संहारः क्व साध्यं क्व च साधनम् । क्व साधकः क्व सिद्धिर्वा स्वस्वरूपेऽहमद्वये ॥ ७ ॥
पदच्छेदः । क्व, सृष्टिः, क्व, च, संहारः, क्व, साध्यम्, क्व, च, साधनम्, क्व, साधकः, क्व, सिद्धिः, वा, स्वस्वरूपे, अहम्, अद्वये ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| अहम्=आत्मा-स्वरूप | साध्यम्=साध्य है |
| अद्वये=अद्वैत | च=और |
| स्वस्वरूपे=अपने स्वरूप में | क्व=कहाँ |
| क्व=कहाँ | साधनम्=साधन है ? |
| सृष्टिः=सृष्टि | क्व=कहाँ |
| च=और | साधकः=साधक है ? |
| क्व=कहाँ | वा=और |
| संहारः=संहार है ? | क्व=कहाँ |
| क्व=कहाँ | सिद्धिः=सिद्धि है ॥ |
भावार्थ । सृष्टि कहाँ ? प्रलय कहाँ ? साध्य कहाँ ? साधन कहाँ ? साधक कहाँ ? और सिद्धि कहाँ । अर्थात् इनमें से कोई भी मुझ अद्वैत-स्वरूप आत्मा में नहीं है ॥ ७ ॥