अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 398, कुल 405 में से
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बीसवाँ प्रकरण । ३९१
मूलम् ।
क्वप्रमाता प्रमाणं वा क्व प्रमेयं क्व च प्रमा ।
क्व किञ्चित्क्व न किञ्चिद्वा सर्वदा विमलस्य मे ॥ ८ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, प्रमाता, प्रमाणम्, वा, क्व, प्रमेयम्, क्व, च, प्रमा,
क्व, किञ्चित्, क्व, न, किञ्चित्, वा, सर्वदा, विमलस्य, मे ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| सर्वदा | = सर्वदा | प्रमेयम् | = प्रमेय है ? |
| विमलस्य | = निर्मल-रूप | च | = और |
| मे | = मुझको | क्व | = कहाँ |
| क्व | = कहाँ | प्रमा | = प्रमा है ? |
| प्रमाता | = प्रमाता है ? | क्व | = कहाँ |
| वा | = और | किञ्चित् | = किंचित् है ? |
| क्व | = कहाँ | वा | = और |
| प्रमाणम् | = प्रमाण है ? | क्व | = कहाँ |
| च | = और | न किञ्चित् | = अकिंचन है ॥ |
| क्व | = कहाँ |
भावार्थ ।
सर्वदा जो उपाधि-रूपी मल से रहित है, अर्थात् जिसमें उपाधि शरीरादिक वास्तव में नहीं हैं । उसमें प्रमातापना, प्रमाणपना और प्रमेयपना कहाँ हो सकता है । अर्थात् प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय ये तीनों अज्ञान के कार्य हैं । जब स्वप्रकाश चेतन में अज्ञान की संभावना मात्र भी नहीं है तब उसके कार्यों की संभावना कैसे हो सकती है, किन्तु कदापि