भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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३९२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

नहीं हो सकती है । और प्रभा जो वृत्तिज्ञान है, वह भी नहीं है । क्योंकि वृत्ति-ज्ञान अन्तःकरण का धर्म है, सो अन्तःकरण ही उस में नहीं है । वह शुद्ध-स्वरूप आत्मा है ॥ ८ ॥

मूलम् ।

क्व विक्षेपः क्व चैकाग्र्यं क्व निर्बोधः क्व मूढ़ता । क्व हर्षः क्व विषादो वा सर्वदा निष्क्रियस्य मे ॥ ९ ॥

पदच्छेदः ।

क्व, च, एषः, व्यवहारः, वा, क्व, च, सा, परमार्थता, क्व, सुखम्, क्व, च, वा, दुःखम्, निर्विमर्शस्य, मे, सदा ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
सर्वदा= सर्वदानिर्बोधः= ज्ञान है ?
निष्क्रियस्य= क्रिया-रहितक्व= कहाँ
मे= मुझकोमूढ़ता= मूढ़ता है ?
क्व= कहाँक्व= कहाँ
विक्षेपः= विक्षेप हैहर्षः= हर्ष है ?
= औरवा= और
क्व= कहाँक्व= कहाँ
एकाग्रयम्= एकाग्रता है ?विषादः= शोक है ?
क्व= कहाँ

भावार्थ ।

शिष्य कहतां है कि हे गुरो ! सर्वदा क्रिया से रहित जो मेरा स्वरूप है, उसमें एकाग्रता कहाँ है ? जहाँ पर प्रथम विक्षेप होता है वहाँ पर विक्षेप की निवृत्ति के लिये एकाग्रता