भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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बीसवाँ प्रकरण । ३९३

की जाती है, सो मेरे में विक्षेप तो तीनों कालों में है नहीं, तब एकाग्रता कौन करे और निबंधिता अर्थात् मूढ़ता भी मेरे में नहीं है, क्योंकि ज्ञान-स्वरूप आत्मा में मूढ़ता तीनों कालों में नहीं है, और हर्ष भी मेरे में नहीं है, और न विषाद है । क्योंकि हर्ष और विषाद दोनों अन्तःकरण के धर्म हैं, वह अन्तःकरण क्रिया वाला है । आत्मा क्रिया-रहित है । उसमें हर्ष और विषाद कहाँ है ॥ ९ ॥

मूलम् । क्व चैव व्यवहारो वा क्व च सा परमार्थता ।
क्व सुखं क्व च वा दुखं निर्विमर्शस्य मे सदा ॥ १० ॥

पदच्छेदः । क्व, च, एव, व्यवहारः, वा, क्व, च, सा, परमार्थता, क्व, सुखम्, क्व, च, वा, दुःखम्, निर्विमर्शस्य, मे, सदा ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
सदा=सर्वदासा=वह
निर्विमर्शस्य=निर्मल-रूपपरमार्थता=परमार्थता है ?
मे=मुझकोवा=अथवा
क्व=कहाँक्व=कहाँ
एषः=यहसुखम्=सुख है ?
व्यवहारः=व्यवहार है ?=और
=औरक्व=कहाँ
क्व=कहाँदुःखम्=दुःख है ॥

भावार्थ । सर्वदा जो निर्विशेष्य अर्थात् वृत्ति-ज्ञान से शून्य जो मैं

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