अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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३९४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
हूँ, मेरे में व्यवहार कहाँ है ? अर्थात् व्यावहारिक पदार्थों का ज्ञान कहाँ है ? और पारमार्थिक ज्ञान कहाँ है ? ये भी दोनों अन्तःकरण के धर्म हैं, और सुख तथा दुःख भी मेरे में नहीं हैं, क्योंकि ये भी दोनों अन्तःकरण के धर्म हैं ॥ १० ॥
मूलम् ।
क्व माया क्व च संसारः क्व प्रीतिर्विरतिः क्व वा ।
क्व जीवः क्व च तद्ब्रह्म सर्वदा विमलस्य मे ॥ ११ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, माया, क्व, च, संसारः, क्व, प्रीतिः, क्व, वा, क्व, जीवः, क्व, च, तत्, ब्रह्म, सर्वदा, विमलस्य, मे ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| सर्वदा | =सर्वदा | प्रीतिः | =प्रीति है ? |
| विमलस्य | =निर्मल | वा | =और |
| मे | =मुझको | क्व | =कहाँ |
| क्व | =कहाँ | विरतिः | =विरति है ? |
| माया | =माया है ? | क्व | =कहाँ |
| च | =और | जीवः | =जीव है ? |
| क्व | =कहाँ | च | =और |
| संसारः | =संसार है ? | क्व | =कहाँ |
| क्व | =कहाँ | तद्ब्रह्म | =वह ब्रह्म है ॥ |
भावार्थ ।
हे गुरो ! सर्वदा विमल उपाधि से शून्य जो मैं हूँ, उस मेरे में माया कहाँ है ? और माया के अभाव होने से माया