भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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बीसवाँ प्रकरण। ३९५

का कार्य जगत् मेरे में कहाँ है ? वह भी तीनों कालों में मेरे में नहीं है ? और प्रीति तथा विरति भी मेरे में नहीं है ? और जीव तथा ब्रह्मभाव भी मेरे में नहीं हैं ? क्योंकि दोनों माया अविद्या-रूपी उपाधियों करके ही कहे जाते हैं। जब कि कोई भी उपाधि वास्तव में नहीं है, तब जीवभाव और ईश्वरभाव भी कहना नहीं बनता है ॥ ११ ॥

मूलम्।

क्व प्रवृत्तिर्निवृत्तिर्वा क्व मुक्तिः क्व च बन्धनम् ।
कूटस्थनिर्विभागस्य स्वस्थस्य मम सर्वदा ॥ १२ ॥

पदच्छेदः।

क्व, प्रवृत्तिः, निवृत्तिः, वा, क्व, मुक्तिः, क्व, च, बन्ध-
नम्, कूटस्थनिर्विभागस्य, स्वस्थस्य, मम, सर्वदा ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
सर्वदा =सर्वदाक्व =कहाँ
स्वस्थस्य =स्थिरनिवृत्तिः =निवृत्ति है ?
कटस्थ-निर्विभागस्य =कूटस्थ और विभाग-रहित =और
क्व =कहाँ
मम =मुझकोमुक्तिः =मुक्ति है ?
क्व =कहाँ =और
प्रवृत्तिः =प्रवृत्ति है ?क्व =कहाँ
वा =अथवाबन्धनम् =बन्ध है ?