अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
बीसवाँ प्रकरण। ३९५
का कार्य जगत् मेरे में कहाँ है ? वह भी तीनों कालों में मेरे में नहीं है ? और प्रीति तथा विरति भी मेरे में नहीं है ? और जीव तथा ब्रह्मभाव भी मेरे में नहीं हैं ? क्योंकि दोनों माया अविद्या-रूपी उपाधियों करके ही कहे जाते हैं। जब कि कोई भी उपाधि वास्तव में नहीं है, तब जीवभाव और ईश्वरभाव भी कहना नहीं बनता है ॥ ११ ॥
मूलम्।
क्व प्रवृत्तिर्निवृत्तिर्वा क्व मुक्तिः क्व च बन्धनम् ।
कूटस्थनिर्विभागस्य स्वस्थस्य मम सर्वदा ॥ १२ ॥
पदच्छेदः।
क्व, प्रवृत्तिः, निवृत्तिः, वा, क्व, मुक्तिः, क्व, च, बन्ध-
नम्, कूटस्थनिर्विभागस्य, स्वस्थस्य, मम, सर्वदा ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| सर्वदा = | सर्वदा | क्व = | कहाँ |
| स्वस्थस्य = | स्थिर | निवृत्तिः = | निवृत्ति है ? |
| कटस्थ-निर्विभागस्य = | कूटस्थ और विभाग-रहित | च = | और |
| क्व = | कहाँ | ||
| मम = | मुझको | मुक्तिः = | मुक्ति है ? |
| क्व = | कहाँ | च = | और |
| प्रवृत्तिः = | प्रवृत्ति है ? | क्व = | कहाँ |
| वा = | अथवा | बन्धनम् = | बन्ध है ? |
३९६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
कूटस्थ-विभाग से रहित और क्रिया से रहित जो मैं हूँ, उस मेरे में प्रवृत्ति कहाँ है ? और निवृत्ति कहाँ है ? मुक्ति कहाँ है ? और बन्ध कहाँ है ? अर्थात् ये सब निर्विकार आत्मा में कभी भी नहीं बन सकते हैं ॥ १२ ॥
मूलम् ।
क्वोपदेशः क्व वा शास्त्रं क्व शिष्यः क्व च वा गुरुः ।
क्व चास्ति पुरुषार्थो वा निरुपाधेः शिवस्य मे ॥ १३ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, उपदेशः, क्व, वा, शास्त्रम्, क्व, शिष्य, क्व, च, वा, गुरुः, क्व, च, अस्ति, पुरुषार्थः, वा, निरुपाधेः, शिवस्य मे ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| निरुपाधेः= | उपाधि-रहित | शिष्यः= | शिष्य है ? |
| शिवस्य= | कल्याण-रूप | च= | और |
| मे= | मुझको | वा= | अथवा |
| क्व= | कहाँ | क्व= | कहाँ |
| उपदेशः= | उपदेश है ? | गुरुः= | गुरु है ? |
| वा= | अथवा | च= | और |
| क्व= | कहाँ | क्व= | कहाँ |
| शास्त्रम्= | शास्त्र है ? | पुरुषार्थः= | मोक्ष |
| क्व= | कहाँ ? | अस्ति= | है ? |
बीसवाँ प्रकरण । ३१७
भावार्थ ।
शिव-रूप अर्थात् कल्याण रूप उपाधि से रहित जो मैं हूँ, उस मेरे लिये उपदेश कहाँ है ? क्योंकि उपदेश जो होता है, अपने से भिन्न को होता है, सो अपने से भिन्न तो कोई भी नहीं है, इस वास्ते शास्त्र-गुरु-रूपी उपदेश कभी नहीं है, और शिष्यभाव तथा गुरुभाव भी नहीं है, क्योंकि ये सभी को ले करके ही होते हैं ॥ १३ ॥
मूलम् ।
क्व चास्ति क्व च वा नास्ति क्वास्ति चैकंकवचद्वयम् ।
बहुनात्र किमुक्तेन किञ्चिन्नोत्तिष्ठते मम ॥ १४ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, च, अस्ति, क्व, च, वा, न, अस्ति, क्व, अस्ति, च, एकम्, क्व, च, द्वयम्, बहुना, अत्र, किम्, उक्तेन, किञ्चित्, न, उत्तिष्ठते, मम, ॥ १४ ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| क्व=कहाँ | क्व=कहाँ |
| अस्ति=अस्ति है ? | द्वयम्=दो है ? |
| च=और | अत्र=इसमें |
| क्व=कहाँ | बहुना=बहुत |
| नास्ति=नास्ति है ? | उक्तेन=कहने से |
| च=और | किम्=क्या प्रयोजन है ? |
| क्व=कहाँ | मम=मुझको |
| एकम्=एक | किञ्चित्=कोई वस्तु |
| अस्ति=है ? | न=नहीं |
| च=और | उत्तिष्ठते=प्रकाश करता है ॥ |
३९८ अष्टावक्र गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
मुझमें अस्ति अर्थात् है, और नास्ति अर्थात् नहीं है, यह भी स्फुरण नहीं होता है । क्योंकि असत्य की अपेक्षा से 'अस्ति' व्यवहार होता है, और सत्य की अपेक्षा से 'नास्ति' व्यवहार होता है, सो मेरे में व्यवहार के अभाव से दोनों नहीं हैं । न एकपना है, न द्वैतपना है । बहुत कथन करने से क्या प्रयोजन है, चैतन्यस्वरूप में कुछ भी नहीं बनता है ॥ १४ ॥
इति श्रीबाबूजालिमसिंहकृताष्टावक्रगीताभाषाटीकायां जीवन्मुक्तचतुर्दशकं नाम विंशतिकं प्रकरणं समाप्तम् ॥ २० ॥