अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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३९६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
कूटस्थ-विभाग से रहित और क्रिया से रहित जो मैं हूँ, उस मेरे में प्रवृत्ति कहाँ है ? और निवृत्ति कहाँ है ? मुक्ति कहाँ है ? और बन्ध कहाँ है ? अर्थात् ये सब निर्विकार आत्मा में कभी भी नहीं बन सकते हैं ॥ १२ ॥
मूलम् ।
क्वोपदेशः क्व वा शास्त्रं क्व शिष्यः क्व च वा गुरुः ।
क्व चास्ति पुरुषार्थो वा निरुपाधेः शिवस्य मे ॥ १३ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, उपदेशः, क्व, वा, शास्त्रम्, क्व, शिष्य, क्व, च, वा, गुरुः, क्व, च, अस्ति, पुरुषार्थः, वा, निरुपाधेः, शिवस्य मे ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| निरुपाधेः= | उपाधि-रहित | शिष्यः= | शिष्य है ? |
| शिवस्य= | कल्याण-रूप | च= | और |
| मे= | मुझको | वा= | अथवा |
| क्व= | कहाँ | क्व= | कहाँ |
| उपदेशः= | उपदेश है ? | गुरुः= | गुरु है ? |
| वा= | अथवा | च= | और |
| क्व= | कहाँ | क्व= | कहाँ |
| शास्त्रम्= | शास्त्र है ? | पुरुषार्थः= | मोक्ष |
| क्व= | कहाँ ? | अस्ति= | है ? |