अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
३९० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
और लोकों के अभाव होने से मुमुक्षु भी नहीं हैं । मुमुक्षु के अभाव होने से ज्ञानवान् योगी भी नहीं है । ऐसा होने से न कोई बद्ध है ? और न कोई मुक्त है ? केवल अद्वैत आत्मा ही है ॥ ६ ॥
मूलम् । क्व सृष्टिः क्व च संहारः क्व साध्यं क्व च साधनम् । क्व साधकः क्व सिद्धिर्वा स्वस्वरूपेऽहमद्वये ॥ ७ ॥
पदच्छेदः । क्व, सृष्टिः, क्व, च, संहारः, क्व, साध्यम्, क्व, च, साधनम्, क्व, साधकः, क्व, सिद्धिः, वा, स्वस्वरूपे, अहम्, अद्वये ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| अहम्=आत्मा-स्वरूप | साध्यम्=साध्य है |
| अद्वये=अद्वैत | च=और |
| स्वस्वरूपे=अपने स्वरूप में | क्व=कहाँ |
| क्व=कहाँ | साधनम्=साधन है ? |
| सृष्टिः=सृष्टि | क्व=कहाँ |
| च=और | साधकः=साधक है ? |
| क्व=कहाँ | वा=और |
| संहारः=संहार है ? | क्व=कहाँ |
| क्व=कहाँ | सिद्धिः=सिद्धि है ॥ |
भावार्थ । सृष्टि कहाँ ? प्रलय कहाँ ? साध्य कहाँ ? साधन कहाँ ? साधक कहाँ ? और सिद्धि कहाँ । अर्थात् इनमें से कोई भी मुझ अद्वैत-स्वरूप आत्मा में नहीं है ॥ ७ ॥
बीसवाँ प्रकरण । ३९१
मूलम् ।
क्वप्रमाता प्रमाणं वा क्व प्रमेयं क्व च प्रमा ।
क्व किञ्चित्क्व न किञ्चिद्वा सर्वदा विमलस्य मे ॥ ८ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, प्रमाता, प्रमाणम्, वा, क्व, प्रमेयम्, क्व, च, प्रमा,
क्व, किञ्चित्, क्व, न, किञ्चित्, वा, सर्वदा, विमलस्य, मे ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| सर्वदा | = सर्वदा | प्रमेयम् | = प्रमेय है ? |
| विमलस्य | = निर्मल-रूप | च | = और |
| मे | = मुझको | क्व | = कहाँ |
| क्व | = कहाँ | प्रमा | = प्रमा है ? |
| प्रमाता | = प्रमाता है ? | क्व | = कहाँ |
| वा | = और | किञ्चित् | = किंचित् है ? |
| क्व | = कहाँ | वा | = और |
| प्रमाणम् | = प्रमाण है ? | क्व | = कहाँ |
| च | = और | न किञ्चित् | = अकिंचन है ॥ |
| क्व | = कहाँ |
भावार्थ ।
सर्वदा जो उपाधि-रूपी मल से रहित है, अर्थात् जिसमें उपाधि शरीरादिक वास्तव में नहीं हैं । उसमें प्रमातापना, प्रमाणपना और प्रमेयपना कहाँ हो सकता है । अर्थात् प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय ये तीनों अज्ञान के कार्य हैं । जब स्वप्रकाश चेतन में अज्ञान की संभावना मात्र भी नहीं है तब उसके कार्यों की संभावना कैसे हो सकती है, किन्तु कदापि
३९२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
नहीं हो सकती है । और प्रभा जो वृत्तिज्ञान है, वह भी नहीं है । क्योंकि वृत्ति-ज्ञान अन्तःकरण का धर्म है, सो अन्तःकरण ही उस में नहीं है । वह शुद्ध-स्वरूप आत्मा है ॥ ८ ॥
मूलम् ।
क्व विक्षेपः क्व चैकाग्र्यं क्व निर्बोधः क्व मूढ़ता । क्व हर्षः क्व विषादो वा सर्वदा निष्क्रियस्य मे ॥ ९ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, च, एषः, व्यवहारः, वा, क्व, च, सा, परमार्थता, क्व, सुखम्, क्व, च, वा, दुःखम्, निर्विमर्शस्य, मे, सदा ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| सर्वदा | = सर्वदा | निर्बोधः | = ज्ञान है ? |
| निष्क्रियस्य | = क्रिया-रहित | क्व | = कहाँ |
| मे | = मुझको | मूढ़ता | = मूढ़ता है ? |
| क्व | = कहाँ | क्व | = कहाँ |
| विक्षेपः | = विक्षेप है | हर्षः | = हर्ष है ? |
| च | = और | वा | = और |
| क्व | = कहाँ | क्व | = कहाँ |
| एकाग्रयम् | = एकाग्रता है ? | विषादः | = शोक है ? |
| क्व | = कहाँ |
भावार्थ ।
शिष्य कहतां है कि हे गुरो ! सर्वदा क्रिया से रहित जो मेरा स्वरूप है, उसमें एकाग्रता कहाँ है ? जहाँ पर प्रथम विक्षेप होता है वहाँ पर विक्षेप की निवृत्ति के लिये एकाग्रता
बीसवाँ प्रकरण । ३९३
की जाती है, सो मेरे में विक्षेप तो तीनों कालों में है नहीं, तब एकाग्रता कौन करे और निबंधिता अर्थात् मूढ़ता भी मेरे में नहीं है, क्योंकि ज्ञान-स्वरूप आत्मा में मूढ़ता तीनों कालों में नहीं है, और हर्ष भी मेरे में नहीं है, और न विषाद है । क्योंकि हर्ष और विषाद दोनों अन्तःकरण के धर्म हैं, वह अन्तःकरण क्रिया वाला है । आत्मा क्रिया-रहित है । उसमें हर्ष और विषाद कहाँ है ॥ ९ ॥
मूलम् ।
क्व चैव व्यवहारो वा क्व च सा परमार्थता ।
क्व सुखं क्व च वा दुखं निर्विमर्शस्य मे सदा ॥ १० ॥
पदच्छेदः । क्व, च, एव, व्यवहारः, वा, क्व, च, सा, परमार्थता, क्व, सुखम्, क्व, च, वा, दुःखम्, निर्विमर्शस्य, मे, सदा ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| सदा=सर्वदा | सा=वह |
| निर्विमर्शस्य=निर्मल-रूप | परमार्थता=परमार्थता है ? |
| मे=मुझको | वा=अथवा |
| क्व=कहाँ | क्व=कहाँ |
| एषः=यह | सुखम्=सुख है ? |
| व्यवहारः=व्यवहार है ? | च=और |
| च=और | क्व=कहाँ |
| क्व=कहाँ | दुःखम्=दुःख है ॥ |
भावार्थ । सर्वदा जो निर्विशेष्य अर्थात् वृत्ति-ज्ञान से शून्य जो मैं
३९४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
हूँ, मेरे में व्यवहार कहाँ है ? अर्थात् व्यावहारिक पदार्थों का ज्ञान कहाँ है ? और पारमार्थिक ज्ञान कहाँ है ? ये भी दोनों अन्तःकरण के धर्म हैं, और सुख तथा दुःख भी मेरे में नहीं हैं, क्योंकि ये भी दोनों अन्तःकरण के धर्म हैं ॥ १० ॥
मूलम् ।
क्व माया क्व च संसारः क्व प्रीतिर्विरतिः क्व वा ।
क्व जीवः क्व च तद्ब्रह्म सर्वदा विमलस्य मे ॥ ११ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, माया, क्व, च, संसारः, क्व, प्रीतिः, क्व, वा, क्व, जीवः, क्व, च, तत्, ब्रह्म, सर्वदा, विमलस्य, मे ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| सर्वदा | =सर्वदा | प्रीतिः | =प्रीति है ? |
| विमलस्य | =निर्मल | वा | =और |
| मे | =मुझको | क्व | =कहाँ |
| क्व | =कहाँ | विरतिः | =विरति है ? |
| माया | =माया है ? | क्व | =कहाँ |
| च | =और | जीवः | =जीव है ? |
| क्व | =कहाँ | च | =और |
| संसारः | =संसार है ? | क्व | =कहाँ |
| क्व | =कहाँ | तद्ब्रह्म | =वह ब्रह्म है ॥ |
भावार्थ ।
हे गुरो ! सर्वदा विमल उपाधि से शून्य जो मैं हूँ, उस मेरे में माया कहाँ है ? और माया के अभाव होने से माया
बीसवाँ प्रकरण। ३९५
का कार्य जगत् मेरे में कहाँ है ? वह भी तीनों कालों में मेरे में नहीं है ? और प्रीति तथा विरति भी मेरे में नहीं है ? और जीव तथा ब्रह्मभाव भी मेरे में नहीं हैं ? क्योंकि दोनों माया अविद्या-रूपी उपाधियों करके ही कहे जाते हैं। जब कि कोई भी उपाधि वास्तव में नहीं है, तब जीवभाव और ईश्वरभाव भी कहना नहीं बनता है ॥ ११ ॥
मूलम्।
क्व प्रवृत्तिर्निवृत्तिर्वा क्व मुक्तिः क्व च बन्धनम् ।
कूटस्थनिर्विभागस्य स्वस्थस्य मम सर्वदा ॥ १२ ॥
पदच्छेदः।
क्व, प्रवृत्तिः, निवृत्तिः, वा, क्व, मुक्तिः, क्व, च, बन्ध-
नम्, कूटस्थनिर्विभागस्य, स्वस्थस्य, मम, सर्वदा ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| सर्वदा = | सर्वदा | क्व = | कहाँ |
| स्वस्थस्य = | स्थिर | निवृत्तिः = | निवृत्ति है ? |
| कटस्थ-निर्विभागस्य = | कूटस्थ और विभाग-रहित | च = | और |
| क्व = | कहाँ | ||
| मम = | मुझको | मुक्तिः = | मुक्ति है ? |
| क्व = | कहाँ | च = | और |
| प्रवृत्तिः = | प्रवृत्ति है ? | क्व = | कहाँ |
| वा = | अथवा | बन्धनम् = | बन्ध है ? |
३९६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
कूटस्थ-विभाग से रहित और क्रिया से रहित जो मैं हूँ, उस मेरे में प्रवृत्ति कहाँ है ? और निवृत्ति कहाँ है ? मुक्ति कहाँ है ? और बन्ध कहाँ है ? अर्थात् ये सब निर्विकार आत्मा में कभी भी नहीं बन सकते हैं ॥ १२ ॥
मूलम् ।
क्वोपदेशः क्व वा शास्त्रं क्व शिष्यः क्व च वा गुरुः ।
क्व चास्ति पुरुषार्थो वा निरुपाधेः शिवस्य मे ॥ १३ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, उपदेशः, क्व, वा, शास्त्रम्, क्व, शिष्य, क्व, च, वा, गुरुः, क्व, च, अस्ति, पुरुषार्थः, वा, निरुपाधेः, शिवस्य मे ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| निरुपाधेः= | उपाधि-रहित | शिष्यः= | शिष्य है ? |
| शिवस्य= | कल्याण-रूप | च= | और |
| मे= | मुझको | वा= | अथवा |
| क्व= | कहाँ | क्व= | कहाँ |
| उपदेशः= | उपदेश है ? | गुरुः= | गुरु है ? |
| वा= | अथवा | च= | और |
| क्व= | कहाँ | क्व= | कहाँ |
| शास्त्रम्= | शास्त्र है ? | पुरुषार्थः= | मोक्ष |
| क्व= | कहाँ ? | अस्ति= | है ? |
बीसवाँ प्रकरण । ३१७
भावार्थ ।
शिव-रूप अर्थात् कल्याण रूप उपाधि से रहित जो मैं हूँ, उस मेरे लिये उपदेश कहाँ है ? क्योंकि उपदेश जो होता है, अपने से भिन्न को होता है, सो अपने से भिन्न तो कोई भी नहीं है, इस वास्ते शास्त्र-गुरु-रूपी उपदेश कभी नहीं है, और शिष्यभाव तथा गुरुभाव भी नहीं है, क्योंकि ये सभी को ले करके ही होते हैं ॥ १३ ॥
मूलम् ।
क्व चास्ति क्व च वा नास्ति क्वास्ति चैकंकवचद्वयम् ।
बहुनात्र किमुक्तेन किञ्चिन्नोत्तिष्ठते मम ॥ १४ ॥
पदच्छेदः ।
क्व, च, अस्ति, क्व, च, वा, न, अस्ति, क्व, अस्ति, च, एकम्, क्व, च, द्वयम्, बहुना, अत्र, किम्, उक्तेन, किञ्चित्, न, उत्तिष्ठते, मम, ॥ १४ ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| क्व=कहाँ | क्व=कहाँ |
| अस्ति=अस्ति है ? | द्वयम्=दो है ? |
| च=और | अत्र=इसमें |
| क्व=कहाँ | बहुना=बहुत |
| नास्ति=नास्ति है ? | उक्तेन=कहने से |
| च=और | किम्=क्या प्रयोजन है ? |
| क्व=कहाँ | मम=मुझको |
| एकम्=एक | किञ्चित्=कोई वस्तु |
| अस्ति=है ? | न=नहीं |
| च=और | उत्तिष्ठते=प्रकाश करता है ॥ |
३९८ अष्टावक्र गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
मुझमें अस्ति अर्थात् है, और नास्ति अर्थात् नहीं है, यह भी स्फुरण नहीं होता है । क्योंकि असत्य की अपेक्षा से 'अस्ति' व्यवहार होता है, और सत्य की अपेक्षा से 'नास्ति' व्यवहार होता है, सो मेरे में व्यवहार के अभाव से दोनों नहीं हैं । न एकपना है, न द्वैतपना है । बहुत कथन करने से क्या प्रयोजन है, चैतन्यस्वरूप में कुछ भी नहीं बनता है ॥ १४ ॥
इति श्रीबाबूजालिमसिंहकृताष्टावक्रगीताभाषाटीकायां जीवन्मुक्तचतुर्दशकं नाम विंशतिकं प्रकरणं समाप्तम् ॥ २० ॥