भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 381, कुल 405 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 381
३७४अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
ज्ञानी= ज्ञानी= और
वन्द्यमानः= स्तुति किया हुआमरणे= मरण में
= नहींन व= कभी नहीं
प्रीयते= प्रसन्न होता हैउद्विजति= उद्वेग करता है
= और= और
निन्द्यमानः= निन्दा किया हुआजीवने= जीवन में
= नहीं= नहीं
कुप्यति= कोप करता हैअभिनन्दति= हर्ष करता है ॥

भावार्थ ।

जीवन्मुक्त ज्ञानी इतर पुरुषों द्वारा स्तुति को प्राप्त हुआ भी हर्ष को नहीं प्राप्त होता है, और इतर पुरुषों द्वारा निन्दा किया हुआ भी क्रोध को नहीं प्राप्त होता है; और मृत्यु के आने पर भी वह भय को भी नहीं प्राप्त होता है । क्योंकि उसकी दृष्टि में आत्मा नित्य है; जन्म-मरण कोई वस्तु नहीं है । उसको अधिक जीने की न इच्छा है, न मरने का शोक है, वह सदा एकरस है ॥ ९९ ॥

मूलम् ।

न धावति जनाकीर्णं नारण्यमुपशान्तधीः ।
यथा तथा यत्र तत्र सम एवावतिष्ठते ॥ १०० ॥

पदच्छेदः ।

न, धावति, जनाकीर्णम्, न, अरण्यम्, उपशान्तधीः, यथा, तथा, यत्र, तत्र, समः, एव, अवतिष्ठते ॥