अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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३५४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
क्व, धैर्यम्, क्व, विवेकित्वम्, क्व, निरातंकता, अपि, वा, अनिर्वाच्यस्वभावस्य, निःस्वभावस्य, योगिनः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| $\left.\begin{matrix}अनिर्वाच्यस्व-\ भावस्य\end{matrix}\right}=$ | $\left{\begin{matrix}अनिर्वचनस्वभाव-\ वाले\end{matrix}\right.$ | विवेकित्वम्= | विवेकता |
| क्व= | कहाँ | ||
| च= | और | वा= | अथवा |
| निःस्वभावस्य= | स्वभाव-रहित | निरातंकत= | निर्भयता |
| योगिनः= | योगी को | अपि= | भी |
| धैर्यम्= | धीरता | ||
| क्व= | कहाँ है | क्व= | कहाँ |
भावार्थ ।
अनिर्वाच्य स्वभाववाले योगी को धीरता कहाँ है ? और विवेकता कहाँ ? स्वभाव-रहित योगी को भय और निर्भयता कहाँ ? वह सदा आनन्द-रूप एकरस है ॥ ७९ ॥
मूलम् ।
न स्वर्गो नैव नरको जीवन्मुक्तिर्न चैव हि ।
बहुनात्र किमुक्तेन योगदृष्टया न किञ्चन ॥ ८० ॥
पदच्छेदः ।
न, स्वर्गः, न, एव, नरकः, जीवन्मुक्तिः, न, च, एव, हि, बहुना, अत्र, किम्, उक्तेन, योगदृष्टया, न, किञ्चन ॥