भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 360, कुल 405 में से

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पृष्ठ 360

अठारहवाँ प्रकरण । ३५३

पदच्छेदः ।

क्व, तमः, क्व, प्रकाशः, वा, हानम्, क्व, च, न, किञ्चन,
निर्विकारस्य, धीरस्य, निरातंकस्य, सर्वदा ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
निर्विकारस्य=निर्विकारवा=अथवा
च=औरक्व=कहाँ
सर्वदा=सर्वदाप्रकाशः=प्रकाश है
निरातंकस्य=निर्भयच=और
धीरस्य=ज्ञानी कोक्व=कहाँ
क्व=कहाँहानम्=त्याग है
तमः=अन्धकार हैन किञ्चन=कुछ नहीं है ॥

भावार्थ ।

हे शिष्य ! जिस विद्वान् के मोहादि-रूप सब विकार दूर हो गए हैं, उसकी दृष्टि में तम कहाँ है ? और तम के अभाव होने से प्रकाश कहाँ है ? ये दोनों सापेक्षिक हैं। एक के न होने से दूसरे की भी स्थिति नहीं है। क्योंकि लौकिक दृष्टि करके ही तम और प्रकाश हैं, सो लौकिक दृष्टि उसकी आत्म-दृष्टि करके नष्ट हो जाती है, इसलिए उसकी दृष्टि में प्रकाश और तम दोनों नहीं रहते हैं। ऐसे विद्वान् को कालादिकों का भी भय नहीं रहता है। उसको न कहीं हानि है, न लाभ है, न किसी में राग है, न द्वेष है, न ग्रहण है, न त्याग है ॥ ७८ ॥

मूलम् ।

क्व धैर्यं क्व विवेकित्वं क्व निरातंकतापि वा ।
अनिर्वाच्यस्वभावस्य निःस्वभावस्य योगिनः ॥ ७९ ॥