भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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पृष्ठ 359

३५२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

ज्ञानात्, गलितकर्मा, यः, लोकदृष्ट्या, अपि, कर्मकृत्, न, आप्नोति, अवसरम्, कर्तुम्, वक्तुम्, एव, न, किञ्चन ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
ज्ञानात् =ज्ञान सेन =
गलितकर्मा =नष्ट हुआ है कर्म जिसका, ऐसाकिञ्चन =कुछ
यः =जो ज्ञानीकर्तुम् =करने को
लोकदृष्टचा =लोक-दृष्टि करकेअवसरम् =अवसर
कर्मकृत् =कर्म का करनेवालाआप्नोति =पाता है
अपि =भीच =और
अस्ति =हैन =
परन्तु =परन्तुकिञ्चन =कुछ
सः =वहवक्तुम्एव =कहने को ॥

भावार्थ ।

जिस विद्वान् का अध्यास कर्मों में आत्म-ज्ञान से नष्ट हो गया है, वह लोक-दृष्टि से कर्म करता हुआ मालूम देता है, परन्तु मैं कर्म को करता हूँ, ऐसा वह कभी भी नहीं कहता है । क्योंकि उसको आत्म-ज्ञान के प्रताप से कर्म-फल की इच्छा ही नहीं होती है ॥ ७७ ॥

मूलम् ।

क्व तमः क्व प्रकाशो वा हानं क्व च न किञ्चन । निर्विकारस्य धीरस्य निरातंकस्य सर्वदा ॥ ७८ ॥