अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 359, कुल 405 में से
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३५२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
ज्ञानात्, गलितकर्मा, यः, लोकदृष्ट्या, अपि, कर्मकृत्, न, आप्नोति, अवसरम्, कर्तुम्, वक्तुम्, एव, न, किञ्चन ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| ज्ञानात् = | ज्ञान से | न = | न |
| गलितकर्मा = | नष्ट हुआ है कर्म जिसका, ऐसा | किञ्चन = | कुछ |
| यः = | जो ज्ञानी | कर्तुम् = | करने को |
| लोकदृष्टचा = | लोक-दृष्टि करके | अवसरम् = | अवसर |
| कर्मकृत् = | कर्म का करनेवाला | आप्नोति = | पाता है |
| अपि = | भी | च = | और |
| अस्ति = | है | न = | न |
| परन्तु = | परन्तु | किञ्चन = | कुछ |
| सः = | वह | वक्तुम्एव = | कहने को ॥ |
भावार्थ ।
जिस विद्वान् का अध्यास कर्मों में आत्म-ज्ञान से नष्ट हो गया है, वह लोक-दृष्टि से कर्म करता हुआ मालूम देता है, परन्तु मैं कर्म को करता हूँ, ऐसा वह कभी भी नहीं कहता है । क्योंकि उसको आत्म-ज्ञान के प्रताप से कर्म-फल की इच्छा ही नहीं होती है ॥ ७७ ॥
मूलम् ।
क्व तमः क्व प्रकाशो वा हानं क्व च न किञ्चन । निर्विकारस्य धीरस्य निरातंकस्य सर्वदा ॥ ७८ ॥