भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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पृष्ठ 358

अठारहवाँ प्रकरण । ३५१

मूलम् । मन्दः श्रुत्वापि तद्वस्तु न जहाति विमूढताम् । निर्विकल्पो बहिर्यत्नादन्तर्विषयलालसः ॥ ७६ ॥

पदच्छेदः । मन्दः, श्रुत्वा, अपि, तत्, वस्तु, न, जहाति, विमूढताम्, निर्विकल्पः बहिः, यत्नात्, अन्तर्विषयलालसः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
मन्दः = मूर्खपरन्तु = परन्तु
तत् = उसबहिः = बाह्य
वस्तु = आत्मा कोयत्नात् = व्यापार से
श्रुत्वा = सुन करकेनिर्विकल्पः = संकल्प-रहित हुआ
अपि = भीअन्तर्विषय-लालसः = भीतर याने मन में विषय का लालसावाला
विमूढताम् = मूढ़ता कोभवति = होता है ॥
न जहाति = नहीं त्याग करता है

भावार्थ । मूर्ख आत्मा का श्रवण करके भी अपनी मूर्खता का त्याग नहीं करता है । मलिन चित्तवाले को आत्मा के श्रवण करने से भी ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती है । मूर्ख बाह्य व्यापार से रहित होता हुआ भी मन में विषयों को धारण किया करता है ॥ ७६ ॥

मूलम् । ज्ञानाद्गलितकर्मा यो लोकदृष्ट्यापि कर्मकृत् । नाप्नोत्यवसरं कर्तुं वक्तुमेव न किञ्चन ॥ ७७ ॥