अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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३५० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
जो विद्वान् नाश से रहित, संतापों से रहित आत्मा को देखता है, उसको विद्या कहाँ ? और शास्त्र कहाँ ? क्योंकि उसकी दृष्टि में न जगत है, और न शरीर है । आत्मा से अतिरिक्त का उसमें स्फुरण नहीं होता है ॥७४॥
मूलम् ।
निरोधादीनि कर्माणि जहाति जडधीर्यदि ।
मनोरथान्प्रलापांश्चकर्तुमाप्नोत्यतत्क्षणात् ॥ ७५ ॥
पदच्छेदः ।
निरोधादीनि, कर्माणि, जहाति, जडधीः, यदि, मनोरथान्, प्रलापान्, च, कर्तुम्, आप्नोति, अतत्क्षणात् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यदि | =जब | अतत्क्षणात् | =तभी से |
| जडधीः | =अज्ञानी | मनोरथान् | =मनोरथों |
| निरोधादीनि | =चित्त-निरोधादिक | च | =और |
| कर्माणि | =कर्मों को | प्रलापान् | =प्रलापों के |
| जहाति | =त्यागता है | कर्तुम् | =करने को |
| आप्नोति | =प्रवृत्त होता है ॥ |
भावार्थ ।
यदि अज्ञानी चित्त के निरोधादि कर्मों का त्याग भी कर देवे, तो भी वह मनोराज्यादिकों और वाणी के प्रलापों को किया करता है ॥ ७५ ॥