भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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३४८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
च =औरक्व =कहाँ
अनन्तरूपेण =अनन्तरूप-सेमोक्षः =मोक्ष है
प्रकृतिम् =माया कोवा =और
न पश्यतः =नहीं देखते हुएक्व =कहाँ
स्फुरतः =प्रकाशमानअर्थात् ज्ञान कोहर्षः =हर्ष है
च =और
क्व =कहाँक्व =कहाँ
बन्धः =बन्धन हैविषादता =शोक है ॥

भावार्थ । जो चिद्रूप आत्मा में कार्य के सहित माया को नहीं देखता है, उसकी दृष्टि में बन्ध कहाँ है ? मोक्ष कहाँ है ? और हर्ष-विषाद कहाँ है ? ॥ ७२ ॥

मूलम् । बुद्धिपर्यन्त संसारे मायामात्रं विवर्त्तते । निर्ममो निरहङ्कारो निष्कामः शोभते बुधः ॥ ७३ ॥

पदच्छेदः । बुद्धिपर्यन्तसंसारे, मायामात्रम्, विवर्त्तते, निर्ममः, निरहङ्कारः, निष्कामः, शोभते, बुधः ।

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
$\left.\begin{aligned} बुद्धिपर्यन्त- \ संसारे \end{aligned}\right}=$बुद्धि पर्यन्त संसार मेंजगत् =जगत्-भाव को
मायामात्रम् =माया-विशिष्ट चैतन्यविवर्त्तते =कल्पित करता है
बुधः =ज्ञानी पुरुष